Author: anil trivedi

  • आनन्द का सनातन प्रवाह

    हिन्दूदर्शन या सनातन विचार ने विचार के चैतन्य स्वरूप या तारक शक्ति के विराट स्वरूप को समझाऔर सनातन सभ्यता के रूप में निरन्तर विस्तारित किया।जीवन और जीव की जड़ता या मारक शक्ति को स्वीकार नहीं किया।अंधकार है तो प्रकाश की ओर बढ़ो,धूल और धुआं है तो दूर हट जाएं स्थान बदल दें या तात्कालिक उपाय…

  • इको सिस्टम बनाम ईगो सिस्टम

    इको सिस्टम और ईगो सिस्टम दोनों ही इस धरती पर जीवन की गुणवत्ता को गहरे से प्रभावित करते हैं।हवा ,पानी ,प्रकाश, मिट्टी और अनन्त रूप स्वरूप की वनस्पतियों से इको सिस्टम अस्तित्व में आया। इको सिस्टम को जीवन का बीज भी कह या मान सकते हैं। इसी तरह मन, विचार, लोभ ,लालसा या इच्छा, समृद्धि-…

  • हमारी पसंद नापसंद और गांधी के सनातन जीवन मूल्य

    सत्य सनातन है,सत्य की महत्ता सब स्वीकारते हैं। हमारे समूचे जीवन के प्रसंगों में आजीवन सत्य को अपनाने की हम सब प्रायःहिम्मत ही नहीं जुटा पाते। ऐसा करते हुए हम झिझकते भी नहीं।असत्य,सत्य का न होना न होकर सत्य को अपनाने की हिम्मत का न होना है। गांधी ने अपने जीवन को सत्य के प्रयोग…

  • बढ़ती आबादी समस्या नहीं प्रति दिन उपलब्ध प्राकृतिक लोकऊर्जा है।

    भारतीय दर्शन में विचार विमर्श द्वारा समस्या समाधान की लम्बी और मजबूत विरासत रहीं हैं।जिसे आगे बढ़ाकर समाधान खोजने के बजाय समाज के तथाकथित आगे वान चिन्तन के बजाय चिंता व्यक्त करते हुए समाधान खोजने की सतही बात करते हैं। भारत देश कोई भीड़ भरा रेल का डिब्बा नहीं है जिसमें बैठने की जगह नहीं…

  • समय भी प्रकाश जैसा ही है सनातन नित्य नूतन।

    समय सदैव अबाध और नित्य नूतन स्वरूप में मौजूद हैं। पर हम हमारी समझ और सुविधा के लिए उसकी गणना कर उक्त मनुष्यकृत गणना के संदर्भ में ही हम सभी मनुष्य समय से साक्षात्कार करते हैं। जैसे प्रकाश सदैव है पर पृथ्वी की निरन्तर गतिशीलता से हमें दिन – रात की अनन्त काल से अनुभूति…

  • मौन , शब्द से व्यापक अभिव्यक्ति है |

    मौन का विस्तार अनन्त है या यह भी कहा जा सकता हैं कि मौन की व्यापकता सीमा से परे होकर मौन पूर्णत:असीम हैं। मौन ध्वनि विहीन होते हुए भी सार्थक होकर, एक तरह से शब्दों की निराकार अभिव्यक्ति है। जैसे प्रकाश निशब्द होकर सतत कम ज्यादा तीव्रता से कालक्रमानुसार अभिव्यक्त होता ही रहता है वैसे…

  • अपने पर और दुनिया-जहान पर भरोसा करना ही जीवन काल की चुनौतियों का हल है।

    आठ अरब जनसंख्या वाली इस विशाल दुनिया में कोई भी मनुष्य अकेला क्यों महसूस करने लगता है?इतने बड़ी दुनिया में जहां हर कहीं लोग ही लोग दिखाई देते हैं।वहां किसी मनुष्य को जब यह लगने लगता है कि वह इस दुनिया में निपट अकेला है ! उसकी बातों को कोई सुनने समझने वाला ही इस…

  • हिंसा, नफ़रत की चुनौती और शांति – सद्भाव की भूख ।

    हिंसा और नफ़रत मानव समाज के स्थायी भाव नहीं है। जैसे प्राकृतिक आग सदैव प्रज्वलित नहीं रहती वैसे ही साम्प्रदायिक और जातीय हिंसक धटनाएं भी तात्कालिक रूप से ही धटती है। आज ही नहीं सदियों पहले मनुष्य के मन में हिंसा और नफ़रत के भाव का उदय हुआ। पर एक भी मनुष्य या समाज ऐसा…

  • ख़यालात बदलोगे तो हालात बदलेंगे!

    हालात अपने आप नहीं बदलते हैं। हालात बदलने के लिए ख़यालात में बदलाव बहुत जरूरी है। दुनिया के सारे बदलाव अपने आप नहीं आते हैं। जैसे जैसे ख़यालात बदलते गए हालत भी बदल गए।आज जिस तेजी से हालात बदलते जा रहे हैं उस तेजी से लोगों के ख़यालात नहीं बदल रहे हैं। पिछले सौ सालों…

  • धरती के सम्बन्ध में एक भी मनुष्य न तो बाहरी है न ही धुसपैठिया

    ‘सबकी धरती ,सब धरती के ‘भाव से दूर क्यों है मनुष्य ? असंख्य ग्रह नक्षत्रों व तारामंडल को लेकर हमारे मन में कभी यह विचार नहीं आता की यह आकाशगंगा किसकी है? धरती को लेकर भी मेरे तेरे का भाव भी हमारे मन में नहीं आता।तो फिर देश प्रदेश ,शहर गांव, समाज जाति, धर्म भाषा,…