समय सदैव अबाध और नित्य नूतन स्वरूप में मौजूद हैं। पर हम हमारी समझ और सुविधा के लिए उसकी गणना कर उक्त मनुष्यकृत गणना के संदर्भ में ही हम सभी मनुष्य समय से साक्षात्कार करते हैं। जैसे प्रकाश सदैव है पर पृथ्वी की निरन्तर गतिशीलता से हमें दिन – रात की अनन्त काल से अनुभूति होती आई है। हमारी इस एकांगी अनुभूति से प्रकाश की उपस्थिति या अस्तित्व पर कोई असर नहीं होता है पर हमारी समझ पर असर ज़रूर होता है।जिसे हम दिन रात की संज्ञा देते हैं।इसी तरह समय को भी हम मनुष्यों ने भूत भविष्य और वर्तमान में बांट दिया है। हमारी समूची समझ अपना जीवनकाल जो जन्म से मृत्यु तक का जीवन के एक अंश का एक तरह से साकार स्वरूप हैं की निरन्तर गणना करते रहने की तरह ही है। हमारे जीवन को हम समय या प्रकाश की तरह अभिव्यक्त नित्य नूतन स्वरूप में नहीं समझ पाते। सामान्य ज्ञान की तरह समय की गणना करना हम मनुष्यों के जीवन का एक हिस्सा बन चुका है। आज और कल की अवधारणा इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।प्रकाश की तात्कालिक अनुपस्थिति को हमारी सामान्य समझ अंधकार या रात निरूपित करती है उसी तरह प्रकार प्रकाश की उपस्थिति को हम दिन या उजाले की संज्ञा देते हैं।यह सारी संकल्पनाएं मनुष्य के मन में होने वाली अनुभूतियों की उत्पत्ति ही मानी जा सकती है। पर इस तरह से हम समय और प्रकाश को नहीं समझ पाते हैं।समय को गणना के आधार पर और प्रकाश को पृथ्वी की गति जन्य उपस्थित के आधार पर ही अनुभव कर समझा जाता है। हमारे मन और मस्तिष्क में सापेक्षता के संस्कार इतने गहरे से अंकित है कि जीवित मनुष्य समय की गणना और प्रकाश की उपस्थिति के संदर्भ में ही समय और प्रकाश को देखता समझता है। इसीलिए हम समय को गणना से और प्रकाश को पृथ्वी की गति जन्य उपस्थित और अनुपस्थिति के संदर्भ में ही आजीवन देखते समझते हैं। हमारी समय और प्रकाश की सामान्य समझ और गणना, सोच और अनुभव का एक अलग आयाम है ।समय, स्थान जन्य उपस्थिति के आधार पर उपलब्ध ज्ञान तथा समय और प्रकाश के सनातन स्वरूप में अनुभूति के आधार पर मानवीय समझ में आकाश पाताल जैसा ही सापेक्षता सिद्धांत या स्वरूप मन में उभरता है।समय, प्रकाश और आकाश अनन्त और सनातन है जिसे मापा या गिना नहीं जा सकता फिर भी मनुष्य की अनोखी समझ है कि वह समय और प्रकाश को अनुभव जन्य समझ के मानदंड को मानते हुए ही जानता समझता और मानता और गणना करता है। समय, प्रकाश और आकाश अनन्त और सनातन होकर सदैव अस्तित्व में होकर असीम या अनन्त है। समय के आने जाने की अवधारणा मानवीय मन की अवस्था है।समय और प्रकाश कहीं आता जाता नहीं है।आकाश भी समय और प्रकाश जैसा ही हर कहीं हैं। इन्हें किसी भी स्तर या रूप से बांधा नहीं जा सकता।समूचा जगत और जीवन शून्य और अनन्त है जो एक ही है जिन्हें अलग नहीं किया जा सकता है। शून्य में ही अनन्त समाया है और अनन्त में ही शून्य समाहित है। जैसे सागर में लहरें हैं और लहरें ही सागर है। दोनों को पृथक नहीं किया जा सकता है पर दोनों को एक साथ देखा और अनुभव किया जा सकता है।इसी तरह समय,आकाश और प्रकाश का सम्मिलन भी है तीनों में नाम रूप का भेद मनुष्य को अनुभव होता है पर मूल रूप से तीनों का पृथक अस्तित्व नहीं है तीनों एक ही होते हुए भी भिन्न-भिन्न अनुभूत होते हैं।
मानव मन भी अथाह है, देखिए मानव ने सब कहीं अस्तित्व में उपस्थित प्रकाश से दूरी की कल्पना का बोध खोज डाला और समूची आकाशगंगाओं की आपसी दूरी को प्रकाश वर्ष के रूप में समय की गणना का एक माप बना डाला।अनन्त और असीम को नहीं मापा जा सकता फिर भी मनुष्य के मन ने प्रकाश वर्ष को समय की गणना का एक माप बना दिया।आकाश को मापा नहीं जा सकता पर आकाश में स्थित या समाहित ग्रह, नक्षत्र और आकाशगंगाओं की आपसी दूरी को प्रकाश वर्ष के मापदंड से मापने की कल्पना साकार स्वरूप में मनुष्य मन में अभिव्यक्त हुई और गहराई के साथ हम लोग की वैचारिक समझ में अनन्त काल से समाई हुई है।
समय, प्रकाश और आकाश तीनों की अवधारणा अलग अलग आयामों में मानव मस्तिष्क में समायी होकर भी तीनों एक ही ऊर्जा को अलग अलग आयामों में देखने की समग्र दृष्टि है जो भेद और अभेद की साकार स्वरूप में अभिव्यक्त व्याख्या है जो भिन्न और अभिन्न का अटूट हिस्सा है।हम सब जो चेतन अचेतन के अंश है मूल रूप से अनन्त ऊर्जा के अभिव्यक्त साकार स्वरूप हैं जो निराकार शून्य में विलीन हो अपने आप ही साकार निराकार का अंतहीन सिलसिला बन गये है।