Author: anil trivedi

  • महंगा हमेशा ही अच्छा नहीं खुली लूट भी हो सकती है

    जो जितना मंहगा है वह उतना अच्छा ही हो यह हमेशा जरूरी नहीं है।किस वस्तु की क्या कीमत हो यह तय करने का कोई पैमाना और मापदण्ड दुनिया भर में अभी तक बना नहीं है और शायद बनेगा भी नहीं,फिर भी अधिकांश लोग मंहगें को खुली लूट नहीं मानते या महंगे को लूट की संज्ञा…

  • मुखरता और चुप्पी दोनों अभिव्यक्ति है

    मुक्त समाज भी अभिव्यक्ति को शत प्रतिशत सह नहीं पाता।शब्द विचार और भाषा मर्यादा से मुक्त नही हो सकते यह अलिखित सभ्यता है।शिष्टाचार, आचार व्यवहार की मर्यादा भी सभ्यता के विचार से ही उपजी है।क्रोध और अधीरापन मन की दो स्थितियां हैं जो हमारे आचार व्यवहार को गहरे से प्रभावित करती है।मानव सभ्यता के पास…

  • हर दिन नयी ज़मीन हर दिन नया आसमान

    11सितम्बर 2020 को संत विनोबा भावे के 125 वर्ष पूर्ण होने पर विशेष लेख 11सितम्बर1895 को जन्मे संत विनोबा भावे का आज १२५ वां जयन्ती वर्ष पूरा हो रहा हैं।गांधी १५०में विनोबा १२५ । महात्मा गांधी ने आजादी आंदोलन में विनोबा जी को पहला और पूर्ण सत्याग्रही माना था।मूलत:आध्यात्मिक वृत्ति के युवा विनोबाजी हिमालय में…

  • गांधी महज़ सिद्धांत नहीं सरल व्यवहार है

    (2अक्टूम्बर गांधी जयंती २०२०(गांधी- १५०) के अवसर पर प्रकाशनार्थ लेख ) पोरबन्दर में 2अक्टूम्बर1869 को याने आज से डेढ़ सौ साल पहले जो बालक जन्मा था। वह डेढ़ सौ साल बाद भी आज समूची मनुष्यता के लिये प्रेरक पुंज की तरह हमारे निजी और सार्वजनिक जीवन के सवालों में किसी न किसी रूप में मौजूद…

  • अष्ट चंग पे

    बाल जीवन के आनन्द और कल्पनाशीलता का कोई ओर छोर नही है।भारत और एशिया के बच्चों के खेल कूद की सादगी और कल्पनाशीलता का कोई सानी नहीं है।अष्ट चंग पे ये कोई चीनी साम्राज्य के पुराने राजा का नाम नहीं है।ये नाम है पुरानी पीढ़ी के भारत और एशिया के कई देशों के असंख्य बच्चों…

  • स्वदेशी का अर्थ देशज होना हैं

    हमारी लोक समझ हमें सिखाती हैं जो देशज है,स्थानीय हैं ,वे देशी है।इस तरह लोक मान्यता अनुसार स्वदेशी का अर्थ विदेशी नहीं होना न होकर, देशज होना हैं क्योंकि की कोई स्वदेशी होकर भी भौतिक जीवन के हर रुप रंग और ढंग से पूरी तरह विदेशी याने परावलम्बी होते हैं।जो विदेशी न होकर स्थानीय हैं,मूल…

  • बिना मिले झगड़ते रहने वाली दुनिया

    झगड़ा मनुष्य का गुण है या अवगुण इस पर कोई और टीका टिप्पणी नहीं।पर आज सूचना क्रांति के आभासी युग में शान्त और सरल स्वभाव के दुनिया भर के लोग भी घर बैठे ही झगड़ों के चक्रव्यूह में उलझे ही नहीं, निरन्तर रहने भी लगे हैं।इसी से मैंने शुरूआत में ही स्पष्ट किया कि झगड़ा,…

  • आन्दोलन जीवन का प्रवाह है

    जीवन गतिहीन निस्तेज जड़ता न होकर नित नये प्रवाह की तरह निरन्तर गतिशील तेजस्विता का पर्याय है।किसी सरकार का आना-जाना बनना बिगड़ना महज एक घटना है।प्राय:सरकारें लकीर की फकीर की तरह होती हैं पर जनआन्दोलन हर बार सृजनात्मक परिवर्तन की नयी नयी लकीरें खींचना चाहता हैं।हर आन्दोलन का मूल विचार एकदम सफल ही हो यह…

  • शांति अशांति, विचार और विचारधारा की बुनियाद

    शांति अशांति, विचार और विचारधारा ये सब मनुष्य के मन में सनातन काल से चलने वाली हलचलें है। जैसे प्रकाश में प्राकृतिक प्रवाह के रूप में गति और विस्तार सनातन काल से है। वैसे ही मन और शरीर में भी गति और प्रवाह निरन्तर है।अशांत मन शांति को तलाशता है। शांत मन सारी हलचलों को…

  • भारत में संकीर्ण राजनीतिक हलचलों से दूर अपने आप उभरते वैश्विक परिवार

    भारत सनातन सभ्यता को समझने वाला देश हैं। भारतीय समाज में इन दिनों ऐसी हलचलों का हल्ला गुल्ला जरूरत से ज्यादा चल रहा है जिससे आभास होता है कि भारत में तेजी से व्यापक सोच का दायरा दिन प्रतिदिन घटता जा रहा है। भारत की कई राजनैतिक जमाते संकीर्ण सोच के उभार को ही अपना…