Tag: anil trivedi
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अखबार की वर्षगांठ और काल की चुनौतियों का लोकशिक्षण
आज पांच जून को नईदुनिया की वर्षगांठ हैं,शुभकामनायें और बधाई।नईदुनिया और मेरी उम्र में दो तीन साल का ही अंतर है मैंने ६मई को सत्तर वर्ष पूरे किये।नईदुनिया ५जून को तिहत्तर वर्ष पूरे कर रही है।मैं कह सकता हूं कि मैं नई दुनिया को बचपन से पाठक और लेखक के नाते देख पढ़ रहा हूं…
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रोजी, रोटी जिन्दा रहने की जरुरत हैं |
सब लोग एक समान आर्थिक परिस्थिति के नहीं होते हैं।आज की हमारी दुनिया में अति सम्पन्न से लेकर ,अति विपन्न आर्थिक परिस्थिति के लोग , अपना अपना जीवन अपने हिसाब से जी रहे हैं।भारत में लोकतंत्र और लिखित संविधान हैं।लोकतंत्र में लोगों को गरिमामय तरिके से जीवन जीने का अधिकार हैं पर यह अधिकार कोई…
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शब्दयुद्ध का चक्रव्यूह कैसे टूटे ?
मनुष्य एक ऐसा जीव है जिसे सहज मनुष्य बना रहकर ही जीवन जीते रहने में संतोष नहीं हैं। प्रत्येक मनुष्य में अपनी निजी विशेषता की अनोखी चाह आजीवन बनी रहती है। मनुष्य के मन में विशिष्टता रूपी इस असंतोष ने ही मनुष्य मात्र में नाम-रूप के असंख्य भेद और मत मतान्तर इस धरती पर खड़े…
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घर गांव बस्ती मोहल्लों में मस्त बच्चे
आज कल बच्चे मज़े में हैं।बड़े बहुत परेशान हैं।महामारी से नहीं मथापच्ची और बेबात की मारामारी से।बड़ों को इस समय बच्चों के भविष्य की भी बड़ी चिन्ता हैं।होना भी चाहिए बच्चे देश का भविष्य जो हैं।पर बच्चों को न तो वर्तमान की चिन्ता हैं न भविष्य की।चिन्ता बच्चों का क्षेत्राधिकार नहीं बड़ों का विशेषाधिकार हैं।बड़े…
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मनुष्य भी प्रकृति का अंश हैं
मनुष्य का आकार एक निश्चित क्रम में होता है।जीव के जीवन में गति होती है।जीव के जीवन में स्पंदन होता है।प्रकृति सनातन है।बिना स्पंदन के जीवन की कोई गति नहीं।गतिहीन व्यक्ति समाज को आकार नहीं दे सकता।गतिशील व्यक्ति ही समाज को तात्कालिक रूप से आकार देता आभासित महसूस होता हैं पर मूलत:यह मानवी ऊर्जा का…
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राजा का बाजा बजा
राजा का बाजा बजाना यह सदियों से कई मनुष्यों का मन पसंद काम हैं।जब तक राजा की सत्ता कायम हैं,प्रजा का अघिकांश प्राणप्रण से दिन रात उठते बैठते राजा का बाजा बजाते रहते हैं।कोई सुने न सुने कोई कहे न कहें,राजा सामने हो न हो बाजा बजाना बन्द हीं नहीं होता।जब तक राजा, राजा हैं…
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शिकायत विहीन समाज
क्या कभी यह संभव है की दुनिया के लोग इतने स्वस्थ और प्रसन्न हो जावे कि उनके दिमाग में कभी कोई शिकायत ही न आवे।पर इस का आशय यह नहीं माना जाना चाहिये कि स्वस्थ और प्रसन्न लोगों की कोई शिकायत ही नहीं होती।मनुष्य ऐसा प्राणी है जिसे दूसरे तो छोड़िये अपने आप से भी…
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संविधान की दृष्टि बनाम समाज और राजकाज में दृष्टिभेद
भारत का संविधान अपने नागरिकों के बीच कोई या किसी तरह का भेद नहीं करता।संविधान ने सभी नागरिकों को विधि के समक्ष समानता का मूलभूत अधिकार दिया हैं।पर दैनन्दिन व्यवहार में भारतीय समाज में नामरुप के इतने भेद हैं और संविधान के तहत चलने वाले राजकाज की कार्यप्रणाली भी भेदभाव से मुक्त नहीं हैं।इस तरह…
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मन और तन की ताकत और श्रमनिष्ठ जीवन
भारत जैसे विशाल भू-भाग वाले देश में आज के काल में भी छोटी मोटी मनुष्य बसाहटों में स्थानिय स्तर पर सतत रोजगार की उपलब्धता या अवसरों को बढ़ाने जैसे मूलभूत सवालों को लेकर कोई समग्र दृष्टि और पहल ही मौजूद नहीं है।शरीर श्रम पर जिन्दा मनुष्य किसी तरह जिन्दारहने के लिये अपनी बसाहट, अपना गांव…
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लाक डाउन के बाद स्वैच्छिक सतर्क जीवन
लाक डाउन को हम जीवन रक्षा की समझ का खुला विश्वविध्यालय भी मान सकते हैं।इससे पहले किसी महामारी से सारी दुनिया का इतना व्यापक लोक शिक्षण नहीं हुआ।लाक डाउन ने आज तक हम जिस तरह बिना चिन्ता के लापरवाह अंदाज में जीते रहने के आदि थे उसे इतिहास का हिस्सा बना दिया हैं।अब यदि हम…