Tag: anil trivedi
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जीवन की ऊर्जा का मूल प्रवाह है आहार
जीव ,जगत और जीवन इनके आसपास ही तमाम विचार, मत एवं मतान्तर जन्म लेते हैं, विस्तारित होते रहते हैं और विविध रूप- स्वरूपों में दुनिया के लोकमानस में दर्ज हो जाते हैं। ये विविध विचार और मत मतान्तर निरन्तर कालक्रमानुसार लोकमानस की स्मृतियों में उदित या अस्त होते ही रहते हैं। जगत में व्याप्त अनेकानेक…
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क्षण और अनन्त काल्पनिक गणना के दो बिन्दु है!
मनुष्य की अवधारणाएं गजब की है। अवधारणाओं का जन्म कल्पना करने की मानवीय क्षमता से हुआ है। मानवीय क्षमता के दो आयाम है पहला शारीरिक और दूसरा मानसिक या वैचारिक। शारीरिक क्षमता की एक सीमा है जो मनुष्य मनुष्य में बदलती रहती है।पर मानसिक या वैचारिक क्षमता की कोई अंतिम सीमा रेखा नहीं है। मनुष्य…
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क्या इन्दौर लोकसभा चुनाव में नोटा राजनैतिक प्रतिरोध का प्रतीक बनेगा?
भारत के आम चुनावों में भारतीय मतदाता को केवल अपना मनपसंद जनप्रतिनिधि निर्वाचित करने का ही अधिकार नहीं है भारत के प्रत्येक मतदाता को निर्वाचन में प्रत्याशियों को नापसंद करने का भी संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। भारतीय मतदाता की सामान्य बुद्धि पर भारत का संविधान पूरा-पूरा भरोसा करता है तभी तो मतदान पत्र में निर्वाचन…
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हमारे पास आज है, कल भी आज ही होगा
सनातन समय से हम याने मनुष्यों को आध्यत्मिक वृत्ति के दार्शनिक चिंतक विचारक समझाते रहे हैं कि हमें वर्तमान में जीना चाहिए।वस्तुत:हम पूरा जीवन वर्तमान में ही जीते हैं।हमारे पूरे जीवन काल में वर्तमान ही होता हैं।याने हमारे पास आज हैं,कल भी आज ही होगा।कल आज और कल।हमारी समझ के लिये काल की सबसे आसान…
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गति सदगति दुर्गति
गति का शाब्दिक अर्थ हैं किसी स्थान से दूसरे स्थान पर जाने की क्रिया।सदगति याने सदा चलते रहने वाला जैसे सूर्य या हवा।दुर्गति का सामान्य अर्थ होता हैं बुरी गति या दुर्दशा।इस रूप में जीवन को समझें तो जीवन में भी हर पल यहीं क्रम दिखाई देता हैं।जन्म से मृत्यु तक जाने की क्रिया या…
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घुमक्कड़ी का आनन्द
कुदरत ने हम सब को घुमक्कड़ी करने के लिये ही दो पैर दिये हैं।पर ज्ञान विज्ञान और तकनीक के विस्तार ने पैर पैदल घुमक्कड़ी को पीछे धकेल कर सुबह शाम के एक रस पैदल टहलने की रस्म अदायी में बदल दिया हैं।एक जोड़ी मनुष्य के पैरों ने धरती के चप्पे चप्पे पर अपनी पद छाप…
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धरती की जीवन और भोजन श्रृखंला
जीवन और भोजन दोनों एक दूसरे से इस कदर एकाकार हैं कि दोनों की एक दूसरे के बिना कल्पना भी नहीं की जा सकती हैं।जीवन हैं तो भोजन अनिवार्य हैं।भोजन के बिना जीवन की निरंतरता का क्रम ही खण्डित हो जाता हैं।जीवन श्रृखंला पूरी तरह भोजन श्रृखंला पर हीं निर्भर हैं।कुदरत ने धरती के हर…
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लोकतंत्र में नागरिकत्व की प्राणप्रतिष्ठा
आज से करीब तीस साल पहले स्वाधीनता संग्राम और समाजवादी आन्दोलन के अग्रणी मामा बालेश्वरदयाल से एक शाम उनकी बामनिया स्थित कुटिया में देश की राजनीति पर लम्बी चर्चा के दौरान मैंने मामाजी से पूछा था आगे आने वाले समय में हमारा देश कैसा होगा ? मामाजी ने जवाब दिया अनिल जैसा देश के नौजवान…
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लोग भीड़ नहीं जीवन की पहचान हैं |
लोग याने खालिस मनुष्य।लोग याने जिनकी विशिष्ठ या अलग पहचान नहीं।लोग भीड़ नहीं, जीवन की सनातन पहचान होते हैं।लोगों से कुछ छिपा नहीं होता,वे सबजानते,मानते और पहचानते हैं।दुनियाभर में लोग अपनी सभ्यता को जानते और मानते हैं।लोगों को लोगों के साथ रहने,खाने पीने,उठने बैठने,गाने बतियाने में जीने का जो आनन्द आता हैं,वह मनुष्य की जिन्दगी…
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भय से निर्भयता की और कदम कैसे बढ़े ?
दुनिया के लोगों के मन आज भय से व्याकुल है। दुनिया भर की राज काज की व्यवस्थाओं,समाजों और मनुष्यों के मन में जो चिन्ता और भय अपने जीवन की सुरक्षाऔर जनजीवन की गतिशीलता के बारे व्याप्त हो गया है उससे आज की दुनिया कैसे उबरे? यह वह सवाल है जिसे लेकरआप, हम, सब चिंतनरत हैं।ऊपर…