Author: anil trivedi
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भारतीय लोक मानस में रामनाम समाया हुआ है!
भारतीय लोक मानस लोक महासागर की तरह गहराई लिए हुए है।लोक मानस की गहराई और विविधता अनोखी पर सहजता लिए होती है।हम अगर यह कहे कि भारतीय लोकमानस में रामनाम समाया हुआ है तो इसे अतिशयोक्ति नहीं माना जाएगा। आजादी आन्दोलन के योद्धा और समाजवादी आंदोलन के नेतृत्व करने वाले चिन्तक विचारक डा.राममनोहर लोहिया ने…
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राजनीति महज वोटों का जुगाड नहीं है
लोकतांत्रिक राजनीति का अर्थ किसी भी तरह से वोट का जुगाड करना हो गया है।इस का नतीजा यह हुआ की समाज और राजनीति में बिना वोट की राजनीति पूरी तरह लुप्त हो गयी। भारत में आप सार्वजनिक रूप से कोई भी सवाल उठाओ तो उस पर बहस के बजाय, इसमें क्या राजनीति है ?ऐसा सोचने…
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भारत सबका सब भारत के !
दो हजार चौबीस के लोकसभा चुनाव परिणाम में जो जनादेश आया है वह भारत के आम मतदाताओं की अनोखी दार्शनिक अभिव्यक्ति है। भारत के राजनैतिक दलों और भारतीय राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण दिशा निर्देश भी इस जनादेश में उजागर हुआ है। चुनाव परिणाम से देश में जो सरकार बनेगी उसके लिए भी और देश…
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छ:सौ अरब बनाम पांच रूपये रोज
साठ से सत्तर के दशक में देश की लोकसभा में पहुंचे, भारत की आजादी तथा समाजवादी आन्दोलन के नेता डा.राममनोहर लोहिया ने लोक सभा में सवाल उठाया था, भारत का गरीब साढ़े तीन आने रोज पर जिन्दा है।बड़ा हल्ला मचा था तत्कालीन सरकार ने तत्काल आंकड़ों का जोड़ बाकी गुणाभाग करके डा.लोहिया और देश को…
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गाली और गोली हमारी वैचारिक हार हैं
मनुष्य अपने विचारों को अपना मौलिक गुण मानता हैं।मानवीय सभ्यता का विस्तार मनुष्य के अंतहीन विचार प्रवाहों से हुआ ऐसा माना जा सकता हैं।हांलाकि इस मान लेने पर भी सब सहमत हो यह जरूरी नहीं।फिर भी विचारों का जो सहज प्रवाह हैं वह सहमति,असहमति या सर्वसम्मति का इंतजार नहीं करता वह सनातन स्वरूप में प्रवाह…
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पैसों की सभ्यता और मानव जीवन
आज की दुनिया के लोग पैसों के बिना जीवन की कल्पना नहीं कर पाते हैं।इसी से मनुष्यों के सारे व्यवहार,आचार, विचार सब कुछ पैसों के आसपास चलते हैं।मनुष्य सभ्यता का विस्तार या विकास नदियों के पास ही प्रारम्भ हुआ।घुमन्तु मानव सभ्यता को एक स्थान पर समूह बना कर रहने का विचार भी पानी की उपलब्धता…
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ज्ञान कर्म के मेलजोल से संतुलन आवेगा
संत विनोबा भावे कहते थे वर्तमान शिक्षा यानी पढ़ना लिखना और कुर्सी पर बैठकर हुक्म चलाना।पढ़ना सीखने का मतलब काम छोड़ना।पढ़े-लिखे लोगों को काम करने में शर्म मालूम होती है।यह बिल्कुल खतरनाक हालत है कि समाज में देह और बुद्धि अलग अलग हो।भगवान ने सबको हाथ और बुद्धि दोनों दी हैं।इसलिए जो विद्वान हों,वे कर्मनिष्ठ…
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निर्भयता स्वाधीनता का मूल है
आज़ादी, स्वाधीनता, फ्रीडम ,स्वतंत्रता और मुक्ति का सच्चा अर्थ ,आज हमारे कहे- लिखे हुए केवल बोल चाल के शब्द ही है या वास्तविक स्वरूप में हमारे जन जीवन और अन्तर्मन में जीवन्त रूप से रचा बसा सहज आपसी व्यवहार हैं।आजादी का मूल अर्थ भयमुक्त होना ही हो सकता है।जबतक मन निर्भय न हो स्वाधीनता से…
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अच्छा बुरा दिन रात की तरह ही है
अच्छा होना अपने आप अच्छा है या बुरा होने से अच्छे होने का अस्तित्व है।जैसे कभी रात हो ही नहीं तो शायद दिन की पूछताछ में कमी हो जाये।अच्छे लोग बुराई से परहेज़ करते हैं पर बुरे लोग हमेशा अच्छाई को नकारते नहीं पर बुराई को अपनाये रखने से परहेज़ भी नहीं करते, यदि दुनिया…
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जीवन का प्राकृत स्वरुप ही उत्सव है
जीवन क्या है ?क्या नहीं है? यह तय करना सरल भी है! और चुनौती पूर्ण भी है!एक समझ यह भी है कि जीवन केवल जीवन है ,उससे कम या ज्यादा ,कुछ भी नहीं।पर यह तो बात को बढ़़ने ही नही देना है या शुरू होते ही खत्म करना है।जीवन सनातन होकर निरन्तरता का एक ऐसा…