Author: anil trivedi

  • भारत में युवाओं के कारण दिन दूना बढ़ता बाजार!

    आज भारत में युवा और बच्चे बाजार की समृद्धि का सबसे बड़ा कारक बन गये है। भारतीय आबादी में युवा और बच्चे बहुसंख्यक बन गये है। बुजुर्ग तेजी से अल्पसंख्यक होते जा रहे हैं। राज, बच्चों और युवाओं के सपनों और ताकत को नहीं समझ पा रहा है। पर बाजार को तो भारतीय आबादी में…

  • लोक की हलचल तंत्र का असमंजस

    भारत एक लोकतांत्रिक देश है पर कोरोना काल में हमारे लोकतंत्र के दो हिस्से हो गये।पहला हिस्सा नितनयी हलचल वाला लोक दूसरा हिस्सा लगातार असमंजस में तंत्र।कोरोना ने लोगों के जीवन, और मन में न केवल ढेर सारी चुनौतियां और सवाल खड़े कर दिये साथ ही साथ निरापद जीवन की अंतहीन चाह ने कई सारी…

  • असहमति को कुचलना लोकतंत्र नहीं हैं!

    लोकतंत्र अकेली सहमति का तंत्र नहीं हैं।हर बात में सबको सहमत होना ही होगा यह राजशाही ,सामंतशाही या तानाशाही की जीवनी शक्ति तो हो सकती है पर लोकतंत्र में असहमति की मौजूदगी हीं लोकतंत्र को जीवन्त बनाती हैं।सब एक मत हो और एक अकेला व्यक्ति भी असहमत हो तो ऐसी अकेली और निर्भय आवाज को…

  • सरकारी हिन्दू असरकारी हिन्दू

    सनातन समय से दुनिया भर में हिन्दू दर्शन,जिज्ञासा, जीवनी शक्ति और अध्यात्म की तलाश का विचार या मानवीय जीवनपद्धति ही रहा है।आज भी समूची दुनिया में उसी रूप में कायम हैं।साथ ही सनातन समय तक हिन्दू दर्शन इसी स्वरूप में रहेगा भी। हिन्दू शब्द से एक ऐसे दर्शन का बोध स्वत:ही होता आया है जिसे…

  • राज, समाज की बाजार निष्ठा ने जीवन और अखबारों को व्यावसायिक उत्पाद बना डाला!

    भारतीय समाज के रूप स्वरूप और सोच व्यवहार में पिछले सौ डेढ़ सौ साल में जमीन आसमान का अंतर आया है। जैसे समाज बदला वैसे अखबार भी बदला। आजादी आये पचहत्तर साल हो गये और आजादी से पहले के पचहत्तर सालों से आजादी के बाद के पचहत्तर सालों में सब कुछ बदल गया सारे सन्दर्भ…

  • गैर संवैधानिक हस्तक्षेप, लोकतंत्र और समाज

    लोकतांत्रिक व्यवस्था और समाज संविधानिक प्रक्रियाओं के साथ ही नागरिकों की तेजस्विता के अभाव में प्रभावी रूप से नहीं चल सकता। लोकतंत्र में सबसे बड़ी कमजोरी नागरिकों की तेजस्विता का अभाव और अनमनापन होता है। हमारे लोकतंत्र में लोगों में याचनाभाव का अतिशय विस्तार हुआ।जिसके कारण भीड़तंत्र और भेड़ चाल का उदय हुआ। लोकतांत्रिक देश…

  • धर्म और राजनीति आज की सबसे बड़ी समस्या में बदल गये हैं।

    जीवन को शान्ति और समाधान देने वाले बुनियादी साधन ही मनुष्य समाज की सबसे बड़ी चुनौती या समस्या बन जाये तो आज का मनुष्य क्या करें?यह आज के काल का यक्ष प्रश्न है जिसका उत्तर जो भी मनुष्य आज जीवित है उन्हें ही खोजना होगा। दुनिया भर में राजनीति और धर्म का जो स्वरूप बन…

  • स्वाधीन भारत में प्रेस की स्वाधीनता का सवाल कौन उठाये?

    पत्रकारिता अपने जन्म से ही लोकजागृति और लोकचेतना की वाहक रही है।स्थापित राजनैतिक, धार्मिक , सामाजिक,आर्थिक,आपराधिक माफिया, प्रशासनिक और सतारूढ़ ताकतों से भयभीत हुए बिना निर्भीक लेखन, चिंतन, अभिव्यक्ति और वैचारिक मार्गदर्शन से लोगों को सतत चैतन्य करना ही पत्रकारिता का मूल धर्म और मर्म हैं।जब भारत में लोकतंत्र नहीं था और देश ,विदेशी हुकूमत…

  • भारत की राजनीति का निरन्तर बदलता स्वरूप

    भारत में आजादी और लोकतंत्र आये पचहत्तर साल हो गए। फिर भी भारत के नागरिकों और राजनैतिक दलों के मानस में लोकतंत्र और नागरिकत्व के प्रति प्रायः उदासीनता का भाव लगातार बढ़ ही रहा है।पांच साल में एक बार मतदान करना फिर कोई सक्रिय नागरिक भूमिका नहीं यही प्रायः भारतीय लोकतंत्र में पचहत्तर साल से…

  • तीस जनवरी, हे राम , साकार गांधी निराकार गांधी!

    बिड़ला भवन दिल्ली में तीस जनवरी १९४८की शाम संध्याकालीन प्रार्थना पर निकले साकार गांधी अपने अंतिम शब्द ” हे राम “के साथ अनन्त निराकार में विलीन हो गए। इस जगत में जन्म, जीवन के साकार स्वरूप का प्रारंभ है तो महाप्रयाण जीवन का अनन्त निराकार में विलीन हो जाना। जीव, हाड़ मांस का पुतला ,सामान्य…