भारत में युवाओं के कारण दिन दूना बढ़ता बाजार!

आज भारत में युवा और बच्चे बाजार की समृद्धि का सबसे बड़ा कारक बन गये है। भारतीय आबादी में युवा और बच्चे बहुसंख्यक बन गये है। बुजुर्ग तेजी से अल्पसंख्यक होते जा रहे हैं। राज, बच्चों और युवाओं के सपनों और ताकत को नहीं समझ पा रहा है। पर बाजार को तो भारतीय आबादी में युवा और बच्चों की बहुतायत से जैसे अलादीन का चिराग मिल गया है। बाजार हर उस विचार को अपनाने से नहीं चूकता जो युवा मन की चाह है। राज और समाज युवा और बच्चों के मन को समझने का प्रयास ही नहीं कर रहा है। पर बाजार युवा मन के हर सपने का सौदागर बन गया है। एक तरह से आज के राज और समाज के मन में देश के युवा और बच्चों के अरमानों को पूरा करने का संकल्प ही समाप्त हो गया है। इसके विपरित बाजार ने युवा मन के सपनों को साकार करने के लिए युवाओं की हर जरूरत को समझते हुए विकल्पों का बड़ा बाजार खड़ा कर दिया। आज के भारत में भले ही राज और समाज हर जगह युवा पीढ़ी की मदद के लिए खड़ा नहीं मिलता पर बाजार का विकल्प तो देश के हर कोने में उपलब्ध है।
भारत में काल का विरोधाभास यह है कि देश में युवा आबादी के सामने बेरोजगारी की खुली चुनौती है।पढे लिखे नौजवानों को सपने पूरे करने वाली सरकारी-असरकारी नौकरी सर्वसुलभ भले ही न हो पर इसके विपरित युवाओं की बढ़ती संख्या से बाजार का बेतहाशा विस्तार हुआ है। बाजार और नौजवान आपस में धुलमिल गये है।बच्चों और युवाओं की भारी तादाद से बाजार में नये नये रोजगार खड़े हो गए हैं।जो युवा महंगी पढ़ाई के आकर्षण में नहीं आये है वे बिना पढ़े या काम चलाऊ पढ़कर बाजार में छोटे मोटे व्यापार व्यवसाय में लीन हो गए हैं। छोटे बड़े शहरों में कोचिंग क्लास ने सारा परिदृश्य ही बदल दिया है। रहवासी मकान को भी युवाओं ने रोजगार दे दिया। एक-एक कमरे में तीन -तीन युवा भविष्य के अवसर की चाहना में आज के मकान मालिक को इतना किराया प्रति माह दे रहे हैं जिसकी कल्पना भी मकान मालिक ने कभी नहीं की थी।युवा छात्रों के लिए खाना पकाना और चाय-नाश्ता और दोनों समय का भोजन एक पूर्णकालिक रोजगार या बाजार में बदल गया है।
समूचे भारत में युवा आबादी अपने सपने साकार करने के लिए गांव कस्बों से बड़े शहरों में पढ़ाई की प्रतिस्पर्धा में दिन दूनी रात चौगुनी गति से शहरों में रहने या भविष्य तलाशने आती ही जा रही है। गांव और कस्बों में आबादी बड़े नगरों, शहरों के मुकाबले बहुत कम है। गांव कस्बों की आबादी युवा पीढ़ी के शहरी बाजार में बस जाने से बेतहाशा बढ़ती ही जा रही है। अधिकांश भारतीय युवा बाजार में अवसर तलाशने लगे हैं। भारतीय युवा मानस का यह नया आयाम है। राज और समाज आबादी को लेकर तरह -तरह से चिन्ता व्यक्त करते हैं। पर बाजार युवा आबादी को लेकर मस्त है। बाजार का दर्शन है जितनी ज्यादा आबादी उतना बड़ा और जीवन्त बाजार। भारतीय समाज में बाजार का ही आजकल बोलबाला है।राज और समाज तो निरन्तर चिन्ताग्रस्त है। दोनों को समझ ही नहीं आ रहा है कि युवा पीढ़ी से संवाद कैसे करें?
राज्य, समाज और बाजार तीनों का नजरिया युवा पीढ़ी को लेकर एक दम अलग-अलग हैं। राज्य युवा पीढ़ी को लेकर भयभीत या किंकर्तव्यविमूढ़ है।उसे कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है। युवा पीढ़ी किसी भी देश या समाज की सबसे ऊर्जावान शक्ति होती है। पर आज के काल में सर्वाधिक युवा आबादी वाले भारत की सरकारें अपने युवा नागरिकों के सपनों को साकार करने के बजाय बगले झांकने में ही लगी है। युवा पीढ़ी की ऊर्जा को दिशा निर्देश देने में सफल नहीं हो पा रही है यही भारत के आज और कल की सबसे बड़ी चुनौती है। आज का राज और समाज अपने निजी और सार्वजनिक,समारोही आयोजन अब अपने सरकारी अमले से नहीं इवेन्ट मैनेजमेंट वालों को ही सौंपने के आदि हो चुके हैं। यही हाल समाज का भी है किसी परिवारजन या परिचित के बजाय बाजार वालों को ही अपने निजी और सार्वजनिक समारोह का पूरा दायित्व देकर अपने उत्तरदायित्व को पूरा करने में शान समझते हैं। आज के भारत में घर परिवार में कामकाजी सदस्यों का अकाल होता जा रहा है। पर भारतीय बाजार युवा आबादी के विस्फोट से राज, समाज और परिवार के सारे कामों को करने में एक क्षण भी नहीं लगता। भारतीय युवा भारत के बाजार ही नहीं वैश्वीकरण उदारीकरण और भूमंडलीकरण के गर्भ से निकले सारी दुनिया के बाजार में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की प्रतिस्पर्धा में प्राण प्रण से जूट गये है। भारतीय समाज में राज और समाज पर बाजार का छा जाना एक ऐसी घटना है जिसने मनुष्य समाज की परम्परागत अवधारणाओं को तेजी से बदल डाला है।