Author: anil trivedi

  • इन्दौर में जीवन शैली की तरह ही राजनीति भी बदल गई है !

    जब देश आजाद हुआ तब देश के साथ इन्दौर में भी राजनीतिक सोच समझ और गतिविधियों में सद्भाव सहयोग और उत्साह का वातावरण दिखाई देता था।आज के कालखंड के मुकाबले दैनंदिन राजनीतिक गतिविधियों की तासीर में जमीन आसमान का अंतर आ गया है। इन्दौर ही क्या समूची देशव्यापी जीवन शैली में जिस तरह बदलाव हुआ…

  • गांधी के शब्दों में गांधी की बात 

    मोहन दास करमचंद गांधी से महात्मा गांधी तक जो गांधी विचार विरासत के रूप में हमारे पास है उन्हें ज्यों का त्यों पढ़ें तो हमें सरलता से हमारे व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन को संचालित करने में मदद मिलेगी।आज के काल में हमारे व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन में सहजता सरलता और समाधान नहीं मिल रहा है।…

  • भूतपूर्व सवाल और भूतपूर्व जवाब !

    मनुष्य और दिमाग की जुगलबंदी सवाल और जवाब के बगैर नहीं हो सकती। यदि मनुष्य के मस्तिष्क में सवाल ही नहीं आते तो आज भी मनुष्य जस का तस ही होता याने प्रागैतिहासिक काल खंड जैसा आदिमानव। उस समय आदिमानव को कुछ करने और सोचने की जरूरत ही नहीं थी फिर भी उसने निरंतर सोचा…

  • विद्वत्ता – गैर विद्वत्ता विशेषण है, सहजता ही मनुष्यता है!

    पता नहीं मनुष्य का मस्तिष्क सहजता को छोड़कर विद्वत्ता और गैर विद्वत्ता के फेर में क्यों उलझा?सरल सहज मनुष्यता इतने लंबे कालखंड से मनुष्य के मन से निरन्तर क्यों सिकुड़ती जा रही है?क्यों मनुष्य अपनी सहज सरल मनुष्यता को छोड़कर विद्वान बनने के चक्रव्यूह में अपनी गैर विद्वत्ता को जाने अनजाने उजागर करने में ही…

  • भीड़ भरी दुनिया में अकेलेपन की भीड़ !

    आठ अरब मनुष्यों की दुनिया को भीड़ भरी दुनिया की संज्ञा दी जावे तो कोई अतिशयोक्ति नहीं मानी जावेगी। पर आज की भीड़ भरी दुनिया में मनुष्यों के मन में अकेलेपन का अहसास दिन दूना रात चौगुना बढ़ रहा है यह एक नयी बात है। भीड़ और अकेलापन दोनों एक-दूसरे से विरोधाभासी शब्द है। भीड़…

  • सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन, आपातकाल और उन्नीस माह की जेल यात्रा हमारी राजनैतिक समझ के विस्तार बिन्दु हैं !

    राजनैतिक जेल जीवन को प्रायः नागरिक आजादी का हनन या दमन की तरह ही देखा जाता है। पर अब तक दुनिया भर में असंख्य मनुष्यों को राजनैतिक कारणों से जेल यात्रा पर जाने का मौका मिला ।उनके कारागार जीवन में मानवीय मूल्यों के हनन , अन्याय के साथ ही आध्यात्मिक साहित्य और दर्शन के सृजन…

  • विचार बीज है और प्रचार बीजों का अप्राकृतिक विस्तार !

    विचार और प्रचार दोनों के बीच अन्तर्सम्बन्धों पर जब हम सोचते विचारते है तो यह सूत्र मिलता है कि विचार ही प्रचार का जन्मदाता है। विचार मूलतः चिन्तन प्रक्रिया का मूल या बीज ही माना जाएगा। यदि विचार न हो तो चिन्तन, मनन, लेखन और सृजन या विध्वंस कुछ भी उत्पन्न हो ही नहीं सकता।…

  • प्रकृति प्रदत्त वाणी एवं मनुष्य कृत भाषा !

    मनुष्यों को जन्म के साथ ही प्राकृतिक रूप से वाणी मिलती है। मनुष्येतर अन्य जीवों को भी वाणी तो किसी न किसी रूप में मिलती ही है पर मनुष्यों ने जिस रूप स्वरूप में वाणी द्वारा भाषाओं और संगीत को अपने जीवन को अभिव्यक्त करने वाले साधन के रूप में विस्तार दिया यह बिन्दु मानव…

  • भारतीय लोकतंत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही असमंजस में हैं !

    लोकतंत्र एक पक्षीय या एक दलीय नहीं हो सकता है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की सामान्य न्यूनतम निरंतर उपस्थिति से ही सामान्य रूप से लोकतंत्र सहजता से चल सकता है। भारतीय लोकतंत्र बहुदलीय होकर अपने जन्म के पचहत्तर वर्ष पूरे कर चुका है। इतना समय बीत जाने पर भी भारतीय लोकतंत्र में सहज सत्ता…

  • आठ अरब मनुष्य याने आठ अरब विचार शैली और स्वभाव !

    मनुष्य को जन्म के साथ ही मनुष्य शरीर को आकार मिलता है।पर मनुष्य का आकार ,आचार, विचार और स्वभाव अपने आप में मनुष्यता का पर्याय नहीं बन जाते। मनुष्य और पशु या अन्य जीव जन्तुओं में यही मूलभूत अंतर है, अन्य सभी जीव जन्तु  जन्माना जिस आकार प्रकार और शैली में जीवन यापन करते हैं…