इन्दौर म.प्र.का सबसे बड़ा शहर हैं पर मन से कस्बाई मानसिकता का भोला भंडारी हैं ,कभी गरम तो कभी नरम। लगातार खाता पीता – रोता गाता शहर हैं। यहां दिन रात उत्सव-तमाशेबाजी से फुर्सत ही नहीं हैं। तमाशबीन लोगऔर झांकी बाज़ आगेवान यहां की शान हैं। यहां सार्वजनिक चुप्पी और खुद का गुणगान भरपूर है।इन्दौर शहर न होकर फलता फैलता व्यवसाय हैं। यहां शहर कहीं कहीं और बाजार हर जगह हैं। नागरिक कम और उपभोक्ता हर कहीं हैं। कभी भी कहीं भी सबकुछ खरीदा बेचा जा सकता है। इन्दौर में पहले पानी की बड़ी कमी थी पर आज इन्दौर पानी का बारहमासी बाजार हैं। प्रशासन की किसम किसम की मनमानी और लोगों की अंतहीन जी हुजुरी जन्य लाचारी इस शहर का महारोग हैं। इन्दौर में देखा जाय तो सबकुछ हैं पर सब कहते हैं यहां मज़ा नहीं हैं । दो-चार साल कहीं और जाकर ही आत्मज्ञान होता हैं इन्दौर जैसा शहर कहीं नहीं है। यहां रहकर इन्दौर की क़दर नहीं पर बाहर भटकने के बाद शहर की शान में कसीदे काढ़ना कोई इन्दौरियों से सीखें। इन्दौर की सबसे बड़ी खासियत यह है की इन्दौर सबका है किसी एक का नहीं।कंगाल से लेकर अरबपति सब अपनी गुजर-बसर यहां हर तरह से करने को आज़ाद हैं। इन्दौर में सबके अपने-अपने कानून कायदे हैं।सब कायदे-कानूनों को जानते भी हैं पर अपने मनपसंद कानून कायदे अपनी सुविधाअनुसार मानते हैं।इन्दौर आमतौर पर शांत है।पर तू तड़ाक से लड़ भीड जाना भी इन्दौर में चलता रहता है। इन्दौर अब अंतहीन निजी वाहनों का शहर है। जो दिनभर दौड़ते ही रहते हैैं। इन्दौर फुर्सत और भागादौड़ी का काकटेल हैं। वाहनों के हार्न और ध्वनि विस्तारक का निरन्तर शोर यहां की स्थायी हलचल हैं। व्यवसाय में हर जगह
हर कहीं भेड़ चाल हैं। इन्दौर बाईक और मोबाइल की जुगलबंदी का शहर है। कोचिंग क्लास और भोजनालय आज इन्दौर के सदाबहार व्यवसाय होते जा रहे हैं। धन्धें के शहर इन्दौर में स्कूल कालेज नम्बर दो पर है तो कोचिंग क्लास नम्बर वन पर हैं। इन्दौर में घर-परिवार सन्नाटें में और होस्टल या पेंईगगेस्ट की चहल-पहल हैं। इन्दौर एक ऐसा शहर है जहां खेल के मैदान सूने है पर हर गली मोहल्लों ,आफिस -बाजार, पढ़ें लिखे से लेकर निट्ठल्ले तक के अपने अपने खेल है और अपनी अपनी कूद हैं। चना जोर की तरह गरम और नरम । इन्दौर में जीवन के सब रंग भी है और भंग की तरंग भी हैं।एक दम शिवजी की बारात हैं हमारा इन्दौर!