इन्दौर और भोपाल की शहरी सामाजिक राजनैतिक प्रशासनिक और व्यावसायिक तासीर में जमीन आसमान का अंतर हैं। फिर भी बिना किसी पूर्व तैयारी के दोनों शहरों के शासन प्रशासन की कमान पुलिस कमिश्नर को सौंपने की घोषणा राज्य सरकार की खासकर मुख्यमंत्री की बिना तैयारी के घोषणा ही मानी जावेगी। पिछले दो-तीन दशकों से म.प्र.के बड़े शहरों इन्दौर भोपाल ग्वालियर जबलपुर में पुलिस कमिश्नर प्रणाली पर कभी कभार चर्चा गोष्ठी तो होती रही हैं।पर यह चर्चा आय ए एस और आई पी एस के बीच की सर्वोच्चता के बीच खींचतान तक ही सीमित रह पाई।पर अचानक दोनों शहरों में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू करने की घोषणा और क्रियान्वयन में तत्परता से यह पता चलता है की मध्य प्रदेश में सरकारी कामकाज विवेकजन्य विचार विनिमय के बजाय कहीं और से फरमान आने से होते हैं।तभी तो दोनों शहरों के लोगों ने इस धोषणा का न तो समर्थन किया और न ही विरोध किया दोनों शहर अनमने बने रहे।
बड़े शहरों में कानून व्यवस्था के सूत्र पुलिस के हाथों हो या जिला प्रशासन के पास यह बहस पुरानी है।पर इन्दौर और भोपाल जैसे मध्य प्रदेश के बड़े शहरों में पिछले दिनों पुलिस कमिश्नर प्रणाली को लागू कर दिये जाने से इस बहस का पटाक्षेप हो गया है।पर फिर भी लोकमानस में कानून व्यवस्था को लेकर बुनियादी सवाल तो बने हुए हैं। मूल मुद्दा यह हैं कि कानून व्यवस्था को बनाए रखने वाले व्यक्ति और संस्थान किस तरह से समूचे परिदृश्य को देखते समझते और समाधान खोजने का पराक्रम बताते है।यह मुख्य मुद्दा है। पुलिस कमिश्नर को कलेक्टर से कई मामलों में अनुमति नहीं लेना होगी यह एकमात्र मुख्य बात इस सम्बन्ध में कहीं जा रही है। पर यहां यक्ष प्रश्न यह हैं कि क्या इन्दौर और भोपाल दोनों शहरों के कलेक्टर और पुलिस कमिश्नर को राज्य शासन के मुखिया और कर्ताधर्ता कार्य की पूर्ण स्वतंत्रता देगें ? और इसी तरह दूसरा सवाल भी खड़ा होता हैं की पुलिस कमिश्नर और कलेक्टर राजनीतिक दबाव के बिना किसी कार्य को करने के लिए स्वतंत्र रह पायेंगे? इन्दौर व्यवसाय व्यापार का बड़ा शहर हैं और भोपाल प्रदेश की राजधानी हैं। दोनों ही आर्थिक और राजनीतिक सत्ता के मुख्य केंद्र हैं। राज्य शासन और और सत्ता की राजनीति का दबाव चाहे कलेक्टर हो या पुलिस प्रशासन दोनों पर ही हर समय होता ही है,तो ऐसे में यह बात तो मुख्य सवाल के रूप में उभरेगी ही कि क्या पुलिस कमिश्नर और कलेक्टर स्वतंत्रता से इन दोनो शहरों में कामकाज करने की मनःस्थिति में होगें भी या नहीं।एक सवाल इस संदर्भ में यह भी कहा गया है कि पुलिस कमिश्नर प्रणाली को इस कारण लागू किया गया है कि भविष्य में इन्दौर और भोपाल जैसे शहर बड़ी तेजी से फैलने की दिशा में बढ़ते जा रहे हैं।तो अतिशय विस्तृत शहरों में कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू की जा रही हैं।याने जितना बड़ा शहर उतनी बड़ी कानून व्यवस्था की चुनौती।याने शासन प्रशासन का यह मानना है कि बड़े शहरों में कानून व्यवस्था बनाए रखने की चुनौती ज्यादा बड़ी होती है अतः पुलिस कमिश्नर प्रणाली बड़े शहरों के लिए जरूरी है। यदि यही राज्य का मूल विचार है तो शहरों को अराजक रुप से क्यों विस्तारित होने देना चाहिए। शहरों के अंधे विस्तार को रोकने की नीति को युद्ध स्तर परअपनाया जाना चाहिए। अभी इन्दौर जितना बड़ा हो गया है उसकी कानून व्यवस्था जिले का प्रशासन और पुलिस प्रभावी रूप से नहीं कर पा रही हैं और इन्दौर को और अधिक तेजी से विस्तारित होते रहने या बढ़ते रहने को नियंत्रित करने में राज्य शासन अपने आप को भी अक्षम मान रहा है या इस संदर्भ में राज्य सरकार की अपनी कोई समझदारी या नीति ही नहीं है। राज्य को हर विषय में व्यापक और दूरगामी परिणाम की दृष्टि से ही सोचना विचारना चाहिए और निरापद शहरी जीवन कैसे खड़ा हो इसकी नीति बनाने की हर समय तत्परता रखनी चाहिए।जितने बड़े शहर उतनी बड़ी कानून व्यवस्था की चुनौती। कानून व्यवस्था बनी रहे इसलिए अंधे अराजक शहरीकरण को कैसे रोका जाए यह नीति राज्य को अपनानी होगी।तभी पुलिस प्रशासन और जिला प्रशासन ज्यादा अनुकूलता से प्रभावी कार्यवाही कर सकेंगे।
इन्दौर और भोपाल में कानून व्यवस्था से बड़ी समस्या आवागमन के साधनों में विस्फोटक वृद्धि की हैं।इस पर राज्य सरकार, जिला कलेक्टर, पुलिस कमिश्नर और स्थानीय शासन का क्या सोच और समझ है?आम जनता से लेकर पुलिस प्रशासन और राज्य के संसाधनों और ऊर्जा को आवागमन और परिवहन की अराजक स्थिति को भुगतने को ही अभिशप्त हैं। कोई नयापन या नया विचार हमारे निजी और सार्वजनिक मन और सोच में आता ही दिखाई नहीं देता।धुल धुआं प्रदूषण चालान दुर्घटना और तनाव पूर्ण जीवन से निपटने या निजात पाने का क्या रास्ता हो सकता है?यह बुनियादी सवाल हम हल नहीं कर सकते तो पुलिस प्रशासन के स्वरूप को लेकर प्रणाली में व्यवस्थागत परिवर्तन करने को समाधान क्यों मान रहें हैं?
पिछले दो दशकों से इन्दौर के जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन को निरन्तर बिना चूके धारा १४४के प्रतिबंधात्मक प्रावधान के साथ काम करने की लत लग चुकी है। बिना प्रतिबंधात्मक प्रावधान के जिला और पुलिस प्रशासन प्रभावी रूप से कार्य ही नहीं कर सकता यह राज्य सरकार जिला कलेक्टर और पुलिस प्रशासन की बुनियदी और स्थायी समझ है। इन्दौर प्रायः शान्ति प्रिय जीवन चर्या का शहर होते हुए भी राज्य सरकार जिला कलेक्टर और पुलिस प्रशासन को स्थायी रूप से प्रतिबन्धात्मक कानून की जरूरत पड़ती हैं तो सवाल यह हैं कि असामान्य परिस्थितियों में आप सहजता से कार्य कर पायेंगे?आज के काल की खुली चुनौती में हमें अपने राजकाज सामाजिक व्यवहार और राजनीतिक आचरण के साथ ही आम नागरिक में आत्मविश्वास और सार्वजनिक जीवन की मर्यादा और उत्तरदायित्व को भी समझना होगा।तभी हम सब अच्छे से अच्छा निरापद नागरिक जीवन और लोक प्रशासन खड़ा कर पायेंगे। यहीं आज हम सबके शहरीकरण और सार्वजनिक जीवन से उठ रहे ज्वलंत मुद्दे हैं जिन से मुक्त मन से हम सबने सोच-विचार कर निजी और सार्वजनिक जीवन की मर्यादाओं को स्वीकार करना चाहिए। प्रणाली कोई भी हो वह प्रभावी तभी तक हो सकती हैं जब हम खुले मन और विवेक के साथ उसके क्रियान्वयन का अवसर मिल कर साकार करें। प्रणाली में जिला प्रशासन या पुलिस कमिश्नर कौन ज्यादा अधिकार सम्पन्न हैं से ज्यादा जरूरी है निरापद शहरी जीवन के प्रति हमारी बुनियादी प्रतिबद्धता और सार्वजनिक जीवन की मर्यादा को लेकर आपसी समझदारी। आमजनता और शासन प्रशासन के बीच बढ़ती संवादहीनता और मनमानीपूर्ण कार्यप्रणाली कहीं भी और कभी भी प्रभावी नहीं हो सकती हैं यह हम सबने स्वीकार करना चाहिए तभी हम निरापद शहरी जीवन खड़ा कर सकते हैं।