मनुष्यों और मनुष्येतर दुनिया की प्रकृति और जीवन प्रवाह

हमारी आज की दुनिया में मनुष्य और मनुष्येतर जीवन की प्रकृति और प्रवृत्तियां एक दम भिन्न है। मनुष्य की हलचले बुद्धि केन्द्रीत ज्यादा है तो मनुष्येतर हलचलें ज्यादातर भोजन केन्द्रित मुख्यतः भूख और भक्षण को लेकर ही होती है। मनुष्येतर जीवन के पास ध्वनि तो है पर मनुष्य जैसी भाषा संवाद कला या पद्धति विकसित नहीं हुई है। अतः मनुष्येतर जीवन में मत मतान्तर और वाद विवाद अनुपस्थित है।आज की आधुनिक दुनिया में मनुष्य समाज आपसी मत मतान्तर और चीख पुकार,हो हल्ले की अति से अत्यधिक परेशान नजर आता है।इसी वजह से मनुष्य में शांति की तलाश जैसी नयी अभिव्यक्ति को विस्तार मिला। एक मनुष्य दूसरे से विपरीत मत व्यक्त करता है तो दोनों मनुष्य विचलित और उत्तेजित हो अशांत हो जाते हैं। मैं जैसा सोचता हूं वैसा दूसरे क्यों नहीं सोचते? मैं जो कहता हूं उसे दूसरे ज्यों का त्यों क्यों नहीं सोचते इसी को लेकर मनुष्य अपने आप में अशांत और उत्तेजित बना रहता है। मनुष्य के मन में अंतहीन वैचारिक हलचलें निरंतर चलती ही रहती है।इसी से मनुष्य की विचार जन्य भूख चौबीस घंटे बारह महीने चलती ही रहती है।इन हलचलों की पराकाष्ठा यह है कि इस कारण मनुष्य ठीक से सो भी नहीं पाता है।सोता है तब भी शांति नहीं तरह तरह के सपनों की हलचल चलती ही रहती है।

  मनुष्येतर जीवन मनुष्य की अपेक्षा शांत स्वरूप के जीवन व्यतीत कर रहा है। मनुष्येतर जीवन अधिक विविधताओं वाला न हो कर भोजन जुटाना और अपने इर्द-गिर्द चहल-पहल तक ही सीमित है। मनुष्येतर जीवन में वे सारी चुनौती उभरी ही नहीं जो इस दुनिया में मनुष्यों के जीवन में उभरी है। मनुष्य जीवन में नित नई चुनौतियां खड़ी होती ही रहती है और उनके नित नए हल या समाधान भी मनुष्य व्यक्तिश:या हिल मिल कर निकालने की जुगत में लगा रहता है। इसीलिए मनुष्य के जीवन में समाधान और धमासान की जुगलबंदी चलती ही रहती है। 

   मनुष्य जीवन थलचर यानी जमीन पर ही मुख्यतः विस्तार करता है। पर मनुष्य ने अपनी बुद्धि के बल पर नभ और जल में भी अपने जतन से जीवन की हलचलों का उल्लेखनीय विस्तार कर लिया है। मनुष्य जीवन को तकनीक ने जल,नभ और थल पर निरन्तर अपनी हलचलों को करने की शक्ति प्रदान करने का पराक्रम कर डाला है। इसके उलट ज‌लचर जीव जल तक ही जीवन भर सीमित है और नभचर जीव रहते तो धरती पर है पर नभ में भ्रमण की क्षमता रखते हैं। जलचर की कुछ प्रजातियां जमीन पर भी रह लेती है जैसे मेंढक, कछुआ आदि। ऐसे जीव उभयचर कहलाते हैं।

   मनुष्य जगत और जीव जगत दोनों चेतन होने के बाद भी मनुष्य जगत अपनी जीवन शैली से प्रदूषण कारी घटको को अपनी जीवन शैली के उप उत्पाद के रूप में बड़े पैमाने पर और निरन्तर धरती पर छोड़ दिया करते है। इस निरंतर जारी प्रक्रिया के फलस्वरुप धरती का जल,थल और नभ प्रदूषित होता रहता है। जहां सघनता से मनुष्य बसाहट वहां सर्वाधिक प्रदूषण की सधनता बढ़ती ही जाती है। मनुष्य जगत अपनी जीवन शैली कुछ इस तरह की बनाता जा रहा है कि दुनिया भर में मानव बसाहट की सधनता बढ़ती ही जा रही है। मनुष्य के पास तन मन की ताकत से जो जीवन जीने का प्राकृतिक रास्ता था उसे विकसित जीवन शैली के नाम पर अधिकांश मनुष्य त्याग रहे हैं। जिसका सीधा असर यह हुआ है कि अधिकांश मनुष्य कृत्रिम साधनों से जीवन जीने के आदि हो चुके हैं। इस कारण मनुष्येतर जीवन क्रम के सामने भी दिन प्रतिदिन जीवन जीने का संकट बढ़ता ही जा रहा है। दुनिया भर में आटोमोबाइल संसाधनो का  अतिशय विस्तार होने से सड़क दुघर्टना में होने वाली मानवीय मौत की दिन-प्रतिदिन बढ़ती संख्या के अलावा सड़कों पर दौड़ती आटोमोबाइल संसाधनो का अंतहीन सिलसिला असंख्य मनुष्येतर जीवों को असमय मृत्यु के मुंह में धकेल रहा है। मनुष्य का जीवन ख़ुद तो संकटग्रस्त होता जा रहा है साथ ही मनुष्येतर जीवन को भी दिन-प्रतिदिन नित नए संकटों में डाल रहा है। मनुष्य जब तक यह नहीं समझेगा कि सारे समस्याओं की जड़ उसकी जीवनशैली में छिपी है और समस्याओं का निदान भी मनुष्येतर जीवों की तरह प्राकृतिक जीवन शैली में ही है दूसरा कोई रास्ता है ही नहीं।