गांधी के शब्दों में गांधी की बात 

मोहन दास करमचंद गांधी से महात्मा गांधी तक जो गांधी विचार विरासत के रूप में हमारे पास है उन्हें ज्यों का त्यों पढ़ें तो हमें सरलता से हमारे व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन को संचालित करने में मदद मिलेगी।आज के काल में हमारे व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन में सहजता सरलता और समाधान नहीं मिल रहा है। डेढ़ सौ वर्ष पहले जन्मे महात्मा गांधी के विचारों को इस लेख में लगभग ज्यों का त्यों इस लिए प्रस्तुत किया गया है कि हम गांधी की विचार श्रृंखला को सरलता से समझ सकें। गांधी जी के आश्रम जीवन में ग्यारह व्रत मानें गये हैं पहला सत्य, फिर क्रमशः अहिंसा, ब्रह्मचर्य,अस्वाद, अस्तेय, अपरिग्रह,अभय, अस्पृश्यता निवारण, कायिक श्रम, सर्वधर्म समभाव अंतिम स्वदेशी स्पर्श भावना।

(नम्रता)  7.10.1930 को मंगल प्रभात 

में गांधी जी ने “नम्रता”की चर्चा करते हुए कहा – इसे व्रतों में पृथक् स्थान नहीं है और हो भी नहीं सकता। अहिंसा का यह एक अर्थ है, अथवा यों कहिए कि उसके अन्तर्गत है; परन्तु नम्रता अभ्यास से प्राप्त नहीं होती,वह स्वभाव में ही आ जानी चाहिए।जब आश्रम की नियमावली पहले पहल बनी तब मित्रों के पास उसका मसविदा भेजा गया था।सर गुरुदास बैनर्जी ने नम्रता को व्रतों में स्थान देने की सूचना की थी और तब भी उसे व्रतों में स्थान न देने का मैंने वही कारण बतलाया था जो यहां लिख रहा हूं। यद्यपि व्रतों में उसे स्थान नहीं है तथापि वह व्रतों की अपेक्षा शायद अधिक आवश्यक है; आवश्यक तो है ही। परन्तु नम्रता किसी को अभ्यास से प्राप्त होती नहीं देखी गई।सत्य का अभ्यास किया जा सकता है, परन्तु नम्रता के सम्बन्ध में, कहना चाहिए कि उसका अभ्यास करना दंभका अभ्यास करना है। यहां नम्रता से तात्पर्य उस वस्तु से नहीं है जो बड़े आदमियों में एक दूसरे के सम्मानार्थ सिखाईं -पढाई जाती है। कोई बाहर से दूसरे मनुष्य को साष्टांग नमस्कार करता हो,पर मन में उसके सम्बन्ध में तिरस्कार भरा हुआ हो तो यह नम्रता नहीं लुच्चई है। कोई रामनाम जपता रहे,माला फेरे, मुनि सरीखा बनकर समाज में बैठे, पर भीतर स्वार्थ भरा हो, तो वह नम्र नहीं,पाखण्डी है।नम्र मनुष्य खुद नहीं जानता कि कब वह नम्र हैं।सत्य का नाप हम अपने पास रख सकते हैं,पर नम्रता का नहीं। स्वाभाविक नम्रता छिपी नहीं रहती, तथापि नम्र मनुष्य खुद उसे देख नहीं सकता। वशिष्ट-विश्वामित्र का उदाहरण तो आश्रम में हम लोगों ने अनेक बार सुना और समझा है।हमारी नम्रता शून्यता तक पहुंच जानीं चाहिए।हम कुछ है यह भूत मन में घुसा कि नम्रता हवा हो गई और हमारे सारे व्रत मिट्टी में मिल गए।व्रत पालन करने वाला यदि अपने मन में व्रत पालन का गर्व रखें तो व्रतों का मूल्य खो देगा और समाज में विषरूप हो जायगा। उसके व्रत का मूल्य न समाज ही करेगा,

न वह ही उसका फल भोग सकेगा। नम्रता का अर्थ है अहं भाव का  आत्यंतिक क्षय। विचार करने पर मालूम हो सकता है कि इस संसार में जीवमात्र एक रजकण की अपेक्षा अधिक कुछ नहीं है।शरीर के रूप में हम क्षणजीवी है।काल के अनंत चक्र में सौवर्ष का हिसाब नहीं किया जा सकता; परन्तु यदि हम इस चक्कर से बाहर हो जाय, अर्थात ‘कुछ नहीं हो जाय’,तो हम सब कुछ हो जायं। होने का अर्थ है ईश्वर से -परमात्मासे-सत्यसे-पृथक हो जाना।कुछ का मिट जाना परमात्मा में मिल जाना है। समुद्र में रहने वाला बिन्दु समुद्र की महत्ता का उपभोग करता है, परन्तु उसे यह ज्ञान नहीं होता। समुद्र से अलग होकर ज्यों ही अपने पन का दावा करने चला कि उसी क्षण सूखा।इस जीवन को पानी के बुलबुलेकी उपमा दी गई है, इसमें मुझे जरा भी अतिशयोक्ति नहीं दिखाई देती।

     ऐसी नम्रता -शून्यता-अभ्याससे कैसे आ सकती है?पर व्रतों को सही रीति से समझ लेने से नम्रता अपने आप आने लगती है।सत्यका पालन करने की इच्छा रखनेवाला अहंकारी कैसे हो सकताहै? दूसरे के लिए प्राण न्यौछावर करनेवाला अपना स्थान कहां घेरने जायगा? उसने तो जब प्राण न्यौछावर करने का निश्चय किया तभी अपनी देहको फेंक दिया। क्या ऐसी नम्रता पुरुषार्थ रहितता न कहलाएगी? हिन्दू धर्म में ऐसा अर्थ अवश्य कर डाला गया है और इससे बहुत जगह आलस्य को, पाखण्ड को स्थान मिल गया है। वास्तव में नम्रता का अर्थ तीव्रतम पुरूषार्थ है; परन्तु वह सब परमार्थ के लिए होना चाहिए। ईश्वर स्वयं चौबीसों घंटे एक सांस काम करता रहता है; अंगड़ाई लेने तक का अवकाश नहीं लेता।हम उसके होजाय, उसमें मिल जायं तो हमारा उद्ववेग भी उसके समान ही अतंद्रित हो गया ही जाना चाहिए। समुद्र से अलग हो जाने वाले बिंदु के लिए हम आराम की कल्पना कर सकते हैं; परन्तु समुद्र में रहने वाले बिन्दु के लिए आराम कहां? समुद्र को एक क्षण के लिए भी आराम कहां मिलता है? ठीक यही बात हमारे संबंध में है। ईश्वर रूपी समुद्र में हम मिले और हमारा आराम गया, आराम की आवश्यकता भी जाती रही। यही सच्चा आराम है।यह महाअशांतिमें शांति है। इसलिए सच्ची नम्रता हमसे जीवमात्र की सेवा के लिए सर्वार्पणकी आशा रखती है। सबसे निवृत्त हो जाने पर हमारे पास न रविवार रह जाता है,न शुक्रवार,न सोमवार।इस अवस्थाका वर्णन करना कठिन है, परन्तु अनुभवगम्य है वह। जिसने सर्वार्पण किया है उसने इसका अनुभव किया है।हम सब अनुभव कर सकते है।यह अनुभव करने के उद्देश्य से ही हम लोग आश्रम में एकत्र हुए  है।सब व्रत,सब प्रवृत्तियां यह अनुभव करने के लिए ही है।यह-वह करते-करते किसी दिन यह हमारे हाथ लग जायगा। केवल उसी को खोजने जाने से वह प्राप्त नहीं है।

   सत्य का पालन कैसे हो? (यरवदा-मंदिर३-७-३२)

जो बात अहिंसा की है वहीं सत्य की समझिए।गाय को बचाने के लिए झूठ बोला जा सकता है या नहीं,इस उलझन में पड़कर अपनी नज़र के नीचे जो रोज हो रहा है उसको भूल जाय तो सत्य की साधना न हो सकेगी,यों गहरे पानी में बैठना सत्य को ढांकने का रास्ता है। तत्काल जो समस्याएं रोज़ हमारे सामने आकर खड़ी हो रही है उनमें हम सत्य का पालन करें तो कठिन अवसरों पर क्या करना होगा इसका ज्ञान हमें अपने आप हो जायगा।

इस दृष्टि से हममें से हर एक को केवल अपने आप को ही देखना है। अपने विचार से मैं किसी को ठगता हूं? अगर मैं ‘ब’ को ख़राब मानता हूं और उसको बताता हूं कि वह अच्छा है तो मैं उसे ठगता हूं। बड़ा या भला कहलाने की इच्छा से जो गुण मुझमें नहीं है उन्हें दिखाने की कोशिश करता हूं? बोलने में अतिशयोक्ति करता हूं?छिपे हुए दोष जिसको बता देना चाहिए उससे छिपाता हूं? मेरा साथी या अफसर कुछ पूछता है तो उसके जवाब में बातों को उड़ा देता हूं?जो कहना चाहिए उसे छिपाता हूं? इनमें से कुछ भी करते हैं तो हम असत्य का आचरण करते हैं,तो हर एक को अपने आप से हिसाब लेकर अपने आप को सुधारना चाहिए।जिसको सच बोलने की आदत पड़ गई हो,ऐसी स्थिति हो गई हो कि असत्य मुंह से निकल ही न सके, वह भले ही अपने आप से रोज़ हिसाब न मांगे;पर जिसमें लेशमात्र भी असत्य हो या जो प्रयत्न करके ही सत्य का आचरण कर सकता हो

उसे तो ऊपर बताई हुई रीति से यही या इस तरह के जितने सवाल सूझे उतने सवालों का जवाब रोज अपने आप को देना चाहिए। यों जो एक महिना भी करेगा उसे अपने आप में हुआ परिवर्तन स्पष्ट दिखाई देगा।

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        ( स्वराज का वास्तविक अर्थ)

     स्वराज का वास्तविक अर्थ समझाते हुए गांधी जी ने कहा कि स्वराज का वास्तविक अर्थ है अपने ऊपर काबू रखना।यह वही मनुष्य कर सकता है जो स्वयं नीति का  पालन करता है, दूसरों को धोखा नहीं देता, माता पिता, स्त्री-बच्चे,नौकर-चाकर, पड़ोसी सबके प्रति अपने कर्तव्य का पालन करता है।ऐसा मनुष्य चाहे जिस देश में हो, स्वराज भोग रहा है। जिस राष्ट्र में ऐसे मनुष्यों की संख्या अधिक हो उसे स्वराज मिला हुआ ही समझना चाहिए।

  अंत में भारत को स्वराज मिले,यह समस्त भारतवासियों की पुकार है और यह उचित ही है; परन्तु स्वराज हमें नीति- मार्ग से प्राप्त करना है।वह नाम का नहीं, वास्तविक स्वराज होना चाहिए।ऐसा स्वराज नाशकारी उपायों से नहीं मिल सकता। उद्योग की आवश्यकता है;पर उद्योग सच्चे रास्ते से होना चाहिए। भारतभूमि एक दिन स्वर्णभूमि कहलाती थी, इसलिए की भारतवासी स्वर्ण रूप से थे।भूमि तो वहीं है,पर आदमी बदल गये हैं, इसलिए यह भूमि उजाड़ -सी हो गई है।इसे पुनः सुवर्ण बनाने लिए हमें सदगुणों द्वारा स्वर्णरूप बनाना है। हमें स्वर्ण बनाने -वाला पारसमणि दो अक्षरों में अन्तर्निर्मित है और वह है ‘सत्य’। इसलिए यदि प्रत्येक भारतवासी ‘सत्य’का ही आग्रह करेगा तो भारत को घर बैठे स्वराज मिला जायगा।