भारतीय लोकतंत्र मजबूत भी है और कमजोर भी है। मजबूत इसलिए की स्वतंत्र भारत की अबतक बनी समस्त सरकारें मतदान से ही जन्मी हैं और कमजोर इस लिए की भारतीय राजनीति के सभी राजनीतिक दलों में दिखावटी लोकतंत्र है वास्तविक लोकतंत्र नहीं है। भारतीय लोकतंत्र में नियमित आमचुनाव होना भारतीय लोकतंत्र की मजबूती का मूल कारण है। आमचुनाव का लगातार और नियमित होना और कभी-कभी कार्यकाल से पहले भी मध्यावधि चुनाव होना भारतीय लोकतंत्र की मजबूती का ही लक्षण माना जावेगा। पर भारतीय लोकतंत्र की कमजोरियों की बात की जावे तो भारत के राजनैतिक दलों में दिखावटी लोकतंत्र वास्तविक लोकतंत्र के स्थान पर मजबूती से जड़े जमायें हुआ दिखाई देता है। भारतीय राजनीति में राजनैतिक दलों में रोजमर्रा के कामकाज की कार्यप्रणाली में दिखावटी लोकतंत्र भी नहीं है। यही कारण है की भारतीय लोकतंत्र में राजनैतिक दलों में व्यक्ति निष्ठ या हाईकमान केन्द्रीत कार्यप्रणाली ही छोटे बड़े राजनैतिक दलों में मजबूत हो चुकी है। इस लिए राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं ने लोकतांत्रिक तरीके को आजादी के पचहतर साल गुजर जाने के बाद भी अपने अपने राजनैतिक दलों में मन वचन और कर्म से लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाने का आग्रह ही छोड़ दिया। कमोबेश सभी राजनैतिक दलों में कार्यकर्ता और हाईकमान दोनों ने ही दलीय राजनीति में लोकतांत्रिक व्यवस्था को मन से आत्मसात ही नहीं किया । हायकमान की जय-जयकार और दलीय अनुशासन के नाम पर राजनैतिक दलों में अलोकतांत्रिक कार्यप्रणाली पर आम सहमति जैसा दृश्य भारतीय राजनीति में स्थायी भाव बन गया है। आज लगभग सभी प्रमुख राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय या छोटे पंजीकृत गौण राजनैतिक दलों में दिखावटी लोकतंत्र है और व्यक्ति निष्ठ हाईकमान कार्यप्रणाली मजबूती के साथ फल-फूल चुकी है। भारतीय नागरिकों या राजनैतिक दलों के कार्यकर्ताओं के मन में भी राजनैतिक दलों में मजबूती से जड़ जमा चुकी अलोकतांत्रिक कार्यशैली में बदलाव करने की बातचीत तो छोड़ दीजिए किसी भी स्तर पर यह मुद्दा राजनीतिक या जनचर्चा का विषय भी नहीं है। यहां अगर यह कहा जावे कि व्यक्ति निष्ठ या हाईकमान केन्द्रीत अलोकतांत्रिक कार्यप्रणाली वाली राजनैतिक जमाते भारतीय लोकतंत्र को निरन्तर चला रही है तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है। भारतीय लोकतंत्र में नागरिकों की भूमिका आमचुनाव में साठ,सत्तर या कभी कभी इससे भी कम - ज्यादा प्रतिशत तक मतदान कर देने तक ही सीमित हो गयी हैं। मतदान के पश्चात अगले आम चुनाव तक नागरिकों की अपनी राय व्यक्त करने और चुनी हुई सरकारों और विपक्षी राजनीतिक दल के काम काज करने या किए गए कार्य कलाप पर लगभग उदासीन भूमिका ही प्रायः दिखाई देती है। इसीलिए आज भारत में आम निर्वाचन में तो मज़बूत लोकतंत्र है पर दैनंदिन जीवन में लोकतांत्रिक व्यवस्था का आग्रह ही विकसित नहीं हो पाया। चौबीस घंटे बारह महीने चौकस और जीवन्त नागरिक समाज का खड़ा न हो पाना भारतीय लोकतंत्र की कमजोरी ही मानी जावेगी। पचहत्तर साल के निरन्तर निर्वाचन वाले लोकतंत्र में सक्रिय भूमिका निभाने वाले नागरिकों की शक्ति का न उभर पाना हमारे लोकतंत्र की कमजोरी ही मानी जावेगी। एक अरब चालिस करोड़ की आबादी वाले देश में लोकतांत्रिक तेजस्विता वाले नागरिकों का उदासीन भूमिका में बदल जाना भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी कमजोरी है। लोकतंत्र की सर्वश्रेष्ठ परिभाषा “लोकतंत्र लोगों का लोगों पर लोगों द्वारा शासन है। “ पर लोग तो छोड़ दीजिए निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को भी निर्णय की स्वतंत्रता नहीं मिले और हाईकमान ही छोटे बड़े राजनैतिक निर्णय का एक मात्र शक्ति केंद्र जनप्रतिनिधियों और नागरिकों द्वारा चाहे अनचाहे अनमने मन या अति उत्साह में स्वीकार कर लिया जाए । तो ऐसे आचरण से लोकतंत्र एक तरह से उदासीन नागरिकों द्वारा ही अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था को जानते बूझते कमजोर करना ही माना जाएगा। बिना नागरिकों की तेजस्विता और निर्भीक सक्रिय भूमिका के लोकतंत्र “तंत्रलोक “का निर्जीव ढांचा ही माना जाएगा। निर्भय नागरिकों द्वारा निरंतर सक्रिय भूमिका ही लोकतंत्र की परिभाषा का साकार स्वरूप हैं। भारतीय लोकतंत्र से लोगो के मन में राज काज में सक्रिय भूमिका की जो भूख कम से कम जगनी चाहिए थी वह भारत के सभी समूहों में हम नहीं जगा पाये, यह हमारे नागरिकत्व की खुली कमजोरी ही है । हमें यह समझना होगा कि कमजोर नागरिकों द्वारा जीवन्त लोकतंत्र नहीं खड़ा होता है।आज भारत का लोकतंत्र भले ही भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था की भूख उस तरह नहीं जगा पा रहा हो जैसी भूख जगनी चाहिए पर फिर भी यह भी एक निर्विवाद सत्य है कि भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था और नियमित निर्वाचित सरकारों की नियमित निरन्तरता से दक्षिण एशिया के भारत के अड़ोस-पड़ोस के सभी देशों में लोकतांत्रिक व्यवस्था की भूख नागरिकों में जगी है और मतदान से सरकार चुनी जाने लगी है। दक्षेस के सभी सदस्य देशों में लोकतांत्रिक व्यवस्था का उदय होना भारतीय लोकतंत्र की मजबूती का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। लोकतंत्र नागरिकों की उदासीन भूमिका और तेजस्विता से ही मजबूत या कमजोर होता है। निर्भय और चैतन्य नागरिकों द्वारा निरंतर सक्रिय भूमिका का निर्वाह ही लोकतंत्र को मजबूत बनाने वाली मुख्य बात है।