एक स्वर – एक रस, जीवन नहीं जड़ता हैं !

जीवन एकांगी नहीं बहुआयामी ऊर्जा हैं। चिंतन मनन और सृजन भी अनन्त हैं। जीवन बन्धन मुक्त ऊर्जा का अविरल प्रवाह हैं। पंचतत्व के मेल से जीवन का अंतहीन साकार स्वरूप प्रगट हुआ हैं। अंतहीन या अनन्त विविधताओं का सिलसिला ही हमारी जिंदगी या धरती का सनातन सत्य है।हम सब जो भी जिस भी रूप स्वरूप में जीवन के जीवन्त स्वरूप में अभिव्यक्त होते हैं ।एक जैसे होकर भी हर कोई या हम सब अपने आप में एक जैसे नहीं होते।प्राणी जगत हो या वनस्पति जगत,हर कहीं भिन्नता-अभिन्नता की एक रूपता  ही अभिव्यक्त हुई है। ध्वनि हो या रुप रंग कुछ भी ,कभी भी ,कहीं भी प्राकृतिक रूप से हूबहू एक जैसा नहीं हो सकता यह जगत का मूल स्वरूप हैं। मनुष्य एकदम से एक जैसा नहीं हो सकता पर उसके द्वारा बनाई गयी मशीन से बनायी गई वस्तु एक जैसी हो सकती है या होती ही है। पर प्रकृति में अभिव्यक्त कोई भी जीव और वनस्पति हूबहू एक जैसी नहीं हो सकती है। प्रत्येक व्यक्ति की विचार प्रक्रिया भी समान नहीं होती हैं। प्रकृति में मिलता जुलता रूप स्वरूप तो होता है पर एक जैसा कुछ भी नहीं है। यही प्रकृति की मूल विशेषता है और शायद इसी कारण प्रकृति हमेंशा नित्य नूतन स्वरूप में हमें अनुभूत होती है। जीवन प्राकृतिक है और व्यवस्था अप्राकृतिक है या मनुष्य निर्मित है।इसीसे कभी भी व्यवस्था पूर्ण नहीं होती हैं, उसमें एकरसता और कृत्रिमता कूट कूट कर भरी रहती है।इसी से मनुष्य के मन की ऊब, व्यवस्था बदल की बात निरन्तर जारी रहती है।यह केवल व्यवस्था के मामले में ही नहीं है वरन् जीवन के हर आयाम में अपने आप होता ही रहता है। विचार और व्यवहार में भी बदलाव की भूख लगना भी प्राकृतिक गुण है। प्राकृतिक जीवन एक रस हो ही नहीं सकता। व्यवस्था बंधनों से चलती है प्रकृति में बंधन का सवाल ही नहीं खड़ा होता है।सब कुछ अपने आप ही प्रवाहित होता रहता है। व्यवस्था मनुष्य के दिमाग की उत्पत्ति है। प्रकृति जीवन की अंतहीन ऊर्जा का सनातन स्वरूप या स्त्रोत है। इसीलिए समूची मानव सभ्यता व्यवस्था के बोझ से दबी रहती है और इसीलिए व्यवस्था बदल का विचार या हलचल सनातन समय से हमारे सोच और व्यवहार में निरन्तर उभरता ही रहता है। व्यवस्था का निर्माण और विसर्जन दोनों ही अप्राकृतिक या मनुष्य की वैचारिक हलचल हैं।

    प्राकृतिक और अप्राकृतिक जड़ चेतन जैसा नहीं है।यह कितना बड़ा रहस्य है कि पंचतत्व से अभिव्यक्त जैविक ऊर्जा या जीवन द्वारा निर्मित वस्तुएं और व्यवस्था अप्राकृतिक है । जीवन या जीव पंचतत्व से अभिव्यक्त होता है फिर भी जीव और जीवन पंचतत्व को कभी भी सूक्ष्मतम रूप में भी अभिव्यक्त नहीं कर सकता ,जीवन पंचतत्व का सम्मेलन हैं। जीव और जीवन की नियति पंचतत्व में विलीन हो जाना तो है पर पंचतत्व को अभिव्यक्त या सृजित नहीं किया जा सकता है। यही जन्म और मृत्यु का सनातन स्वरूप हैं।जन्म पंचतत्वों का साकार  प्राकृतिक क्रम है और मृत्यु जीवन का पंचतत्व में विलीन हो जाना है। जीवन और जीव में जन्म और मृत्यु अभिव्यक्त होती प्रतीत होती है पर यह जैविक ऊर्जा का मूल स्वरूप का अनन्त प्रवाह हैं। जीवन में  हर क्षण जन्म और मृत्यु एक साथ तरंग की तरह प्राकृतिक सनातन स्वरूप में मौजूद हैं। यही कारण लगता है कि प्रकृति का न जन्म होता है न मृत्यु होती है। प्रकृति में हवा, पानी ,अग्नि, मिट्टी और आकाश के अनोखे मेल से जीवन के विशाल प्रवाह की अभिव्यक्ति जीवन और जगत का निरन्तर क्रम है।आज की दुनिया में मनुष्य के अलावा कोई और जीव नहीं है जो प्रकृति से अंधी या वैचारिक प्रतिस्पर्धा में जन्मते ही लग जाता है। मनुष्य प्रकृति की ऐसी बेचैन कृति हैं जो प्रकृति से बचना या प्रकृति पर मनचाहा और मनमाना हस्तक्षेप करने में कभी भी नहीं हिचकिचाता। प्रकृति में जीव और जीवन की अभिव्यक्ति प्रकृति से प्रतिस्पर्धा और हस्तक्षेप करने के लिए नहीं वरन पंच तत्वों से निर्मित जीवन की ऊर्जा के प्राकृतिक स्वरूप से एकाकार होना है। मनुष्य के विचार भी प्राकृतिक ऊर्जा का निराकार विस्तार है। मनुष्य का कृतित्व ऐसे रूप स्वरूप में होना चाहिए कि प्राकृतिक जीवन से एक रूपता और समन्वय उसी तरह रहे जैसे पंचतत्व की ऊर्जा का प्रवाह जीव और जीवन को अभिव्यक्त होते रहने देता है।