हम में से बहुत कम लोग व्यक्तियों, घटनाओं और विचारों को समग्रता से देख,परख और समझ पाते हैं।देश के लोगो, घटनाओं और विचारों के मूल्यांकन में भी हम सबका अधिकांश, बहुत कृपणदृष्टि और एकांगी सोच समझ वाले मनुष्यों की बिरादरी की तरह हो गया है।हममें से अधिकांश हर छोटी मोटी बात का श्रेय खुद के सिर पर रखना चाहते हैं और निजी तथा सार्वजनिक जीवन में खामियों,त्रुटियों कमियों के लिये अन्य समकालीन मनुष्यों,हमारे पुरखों औरअन्य विचारवाले लोगों के विचारों को जिम्मेदार ठहराने में अतिशय उतावलापन बताते हैं।इस कारण हममें से अधिकांश की समझ, सोच और जीवन-दृष्टि इतनी गहरी दार्शनिक विरासत वाले मानव समाज की होने पर भी व्यापक न होकर खुद अपने आसपास ही चलती रहती है,जिसकी परणीति इतनी विराट दुनिया और ज़िन्दगी “मैं “और “मेरे” की सर्वोपरी संकीर्णता में सिमट गयी है।नतीजतन हमारा समूचा जीवन क्रम एक विशाल दुनिया में छोटी सी” मेरी दुनिया” में बदल जाता हैं।भौतिक व शारीरिक रुप में या हम सबके बाहरी स्वरूप में दुनिया भर के मनुष्यों में कमोबेश समानता है। थोड़ा बहुत शरीर के वजन ,चेहरे मोहरे और लम्बाई चौड़ाई में मात्रा और रूप रंग में अंतर होता है।पर सोचने की दृष्टि और विचारों की व्यापकता में हम सब में आकाश पाताल का अंतर हो जाता है, साथ ही कभी कभी कुछ विचार बिन्दुओं में मेल भी हो जाता है। हम सब के मन में आर्थिक और वैचारिक सम्पन्नता विपन्नता का विरोधाभास होता है।हम आर्थिक रूप से बहुत सम्पन्न होकर भी वैचारिक रूप से अत्यन्त विपन्न हो सकते हैं तथा आर्थिक रूप से विपन्न या फटेहाल होकर वैचारिक रूप से अति सम्पन्न भी हो सकते हैं ।यह भी होता है कि न तो हम सम्पन्न हो , न विपन्न हो केवल और केवल सहज मनुष्य हो।आर्थिक सम्पन्नता हमारा बाहरी स्वरूप है जबकी वैचारिक सम्पन्नता हमारा आन्तरिक स्वरूप है। महज मनुष्य होना हमारा मूल स्वरूप है।आर्थिक सम्पन्नता साकार दिखाई देती है ,जबकि वैचारिक सम्पन्नता निराकार होकर परस्पर सत्संग से अनुभव में आती है।
आज के काल में भी पुरातनकाल के मुकाबले देखने और सोचने में कोई विशेष उल्लेखनीय बदलाव हम सब में महसूस नहीं होता।सोच विचार का भेदमूलक वहीं ढर्रा चल रहा है जो पहले और उसके भी पहले चलता रहा है और आज भी चल रहा है।जैसे जो लोग इस दुनिया को संवारने में उत्पादन और निर्माण के कामों में निरन्तर कई पीढियों से लगे हैं वे वैसे ही आज भी लगे हैं।ऐसे मेहनतकश लोग बिना बोले मेहनत करते करते इस दुनिया से चले जाते हैं पर हम ऐसे लोगों को मजदूर के रूप में ही जानते हैं उनसे मजदूरों की तरह ही व्यवहार करते हैं।हर तरह से हुनरमंद मजदूरों के बिना दुनिया का कोई काम चलना संभव नहीं है उसके बाद भी हम सब मजदूरों को मजदूर से ज्यादा हैसियत या सम्मान देने की जरूरत ही नहीं समझते।दुनिया भर में निरन्तर श्रम करने वाले सनातन काल से अनाम ही रहते हैं।कोई उनके योगदान को कभी भूले भटके भी मनुष्य की गौरवगाथा के रूप में कहता या गाता नहीं है।फिर भी दुनिया भर का मजदूर,कारीगर,किसान और खेतिहर मजदूर मौन साधक की तरह अपने कामो को निरन्तर करते रहते है।
मान,सम्मान और अपमान ये मनुष्य मन की ऐसी स्थितियां है जो हम सबके मन में छिपे घनधोर विरोधाभासों को खुले रूप मे उजागर करती हैं।मान सम्मान तो हम सबने अपने लिये सुरक्षित कर रखा है।अपमान श्रमनिष्ठ मौन साधकों के लिये आरक्षित हैं।अपने लिये मान सम्मान की निरन्तर चाहना और मेहनतकश की मेहनत को मान न देना या अपमान करना मनुष्य मन की ऐसी खोट है जो हमसब को कचोटती रहती हैं।इस तरह मेहनतकश उत्पादक लोगों की अनवरत शक्ति का दोहन करने की हम सब में चाहना तो निरन्तर होती है पर ऐसे मौन साधकों को प्रणाम करने की इच्छा भूले भटके भी मन में नहीं आती यह हम सबकी दृष्टि और मूल्यांकन के एकांगीपन को उजागर करता हैं।
हम सब को अच्छी सड़कें,मकान,बड़े बड़े बांध और पुल तथा नितनये निर्माण तो बहुत अच्छे लगते हैं पर यह सारा निर्माण करने वाले लोग हमेशा हमारी दृष्टि में कमजोर वर्ग के लोग ही रहते हैं।”काम करनेवाला कमजोर और बात करनेवाला सिरमौर” यह सोच की समदृष्टि नहीं समझी या मानी जा सकती।भेदभाव मूलक विचार हम सबको अपनाने में झिझक नहीं लगती और समभाव को आजीवन मानना अपनाना कठिन लगता हैं।क्या, सोच,समझ ,विचार, व्यवहार, दृष्टि में मनुष्य को सबके प्रति समभाव रखना संभव नहीं है? या असमानता को अपनाने में हमसब के अधिकांश को आसुरी आनन्द की अनुभूति होती हैं!शायद इसीसे विशाल मानव समाज असमानता का आदी होना पसंद करता हैं।मानव समाज में दर्शन के रूप में महज बातचीत तक समत्व की बात होती है पर हम सब का रोजमर्रा का आचरण और व्यवहार असमानता की अमरबेल की तरह है जो हमारे व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन का अविभाज्य अंग हो गया हैं।
हमारे दर्शन,विधान,संविधान और आदर्श में प्राणीमात्र के साथ एकरूपता और समभाव को स्वीकार किया है।पर हममें से अधिकांश इसे मानने और अंगीकृत करने के बाद भी व्यवहार में लाने के आदी नहीं है।हम सब को हमारे इस सोच और व्यवहार से सामान्यत:आपत्ति भी नहीं होती, मन भी नहीं कचोटता ,फिर भी हम सबकी यह हिम्मत नहीं होती की असमानता के गुण गाये या असमानता को जीवन, समाज और देश दुनिया का आदर्श मान्य करें।आदर्श,सिद्धांत,विधान,संविधान में सुविचारित चिंतन ,मनन ,अध्ययन और सहमति के बाद भी ,,रोजमर्रा का हमारा व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन ,आपस में इस विरोधाभास को अपने जीवन में क्यों अपनाये हुए हैं ?यह वह बड़ा सवाल है जो हम हल नहीं करना चाहते।
सवा सौ साल पहले स्वामी विऐवेकानंद ने इस स्थिति पर बहुत मार्मिक उदगार व्यक्त करते हुए कहा था-“तुम्हारे पितृपुरूष दो दर्शन लिख गये,दस काव्य तैयार कर गये हैं,दस मंदिर उठवा गये हैं और तुम्हारी बुलन्द आवाज से आकाश फटा जा रहा है;और जिनके रूधिर- स्त्राव से मनुष्य जाति की यह जो कुछ उन्नति हुई है,उनके गुणों का गान कौन करता है?लोकजयी, घर्मवीर,रणवीर,काव्यवीर,सबकी आंखों पर ,सबके पूज्य है;परन्तु जहां कोई नहीं देखता,जहां कोई एक भी वाह वाह नहीं करता,जहां सब लोग घृणा करते हैं,वहां वास करती है अपार सहिष्णुता,अनन्य प्रीति और निर्भीक कार्यकारिता;हमारे गरीब,घर-द्वार पर दिन-रात मुंह बन्द करके कर्तव्य करते जा रहे हैं,उसमें क्या वीरत्व नहीं हैं?बड़ा काम आने पर बहुतेरे वीर हो जाते हैं,दस हजार आदमियों की वाहवाही के सामने कापुरुष भी सहज ही प्राण देदेता है;घोर स्वार्थपर भी निष्काम हो जाता हैं,परन्तु अत्यन्त छोटे से कार्य में भी सबके अज्ञात भाव से जो वैसी ही निस्वार्थता,कर्त्तव्यपरायणता दिखाते हैं,वे ही धन्य हैं – वे तुम लोग हो – भारत के हमेशा के पैरों तले कुचले हुए श्रमजीवियो!-तुम लोगों को मैं प्रणाम करता हूं।”