विद्वत्ता – गैर विद्वत्ता विशेषण है, सहजता ही मनुष्यता है!

पता नहीं मनुष्य का मस्तिष्क सहजता को छोड़कर विद्वत्ता और गैर विद्वत्ता के फेर में क्यों उलझा?सरल सहज मनुष्यता इतने लंबे कालखंड से मनुष्य के मन से निरन्तर क्यों सिकुड़ती जा रही है?क्यों मनुष्य अपनी सहज सरल मनुष्यता को छोड़कर विद्वान बनने के चक्रव्यूह में अपनी गैर विद्वत्ता को जाने अनजाने उजागर करने में ही अपना समूचा जीवन जटिल बना लेता है। प्रकृति कभी कृत्रिम नहीं होती है ,सदैव सरल सहज एवं चेतन ही रहती है। प्रकृति के एक अंश वनस्पति जगत का जीवन अंकुरित होने से पुनः बीज बनने तक सदैव एक जैसी सरलतम पर अंतहीन जीवन यात्रा पूरी करते कभी-भी नहीं थकता, प्राणियों में सबसे ज्यादा विकसित होने का दावा करने वाले मनुष्य ने ही विद्वत्ता और गैर विद्वत्ता का द्वंद्व क्यों खड़ा किया? फिर प्रकृति का अंश मनुष्य अपनी समूची जीवन यात्रा में आदि से अंत तक सहज सरल और प्राकृतिक स्वरूप में क्यों नहीं रह पाता है? क्या प्राकृतिक रूप से सदैव सरल सहज रह पाना संभव नहीं है! फिर प्रकृति क्यों सदैव सरल सहज ही रहती है?यह मनुष्य जीवन को लेकर मन में उठा एक यक्ष प्रश्न है कि मनुष्य सदैव सरल सहज मनुष्यता को छोड़कर विद्वान बनने की दौड़ में शामिल होकर अपनी गैर विद्वत्ता को  उजागर क्यों करता है? प्रकृति से एकदम अलग मनुष्य मन की प्रकृति में यह द्वैत भाव क्यों है? प्रकृति सदैव सरल सहज स्वरूप में अभिव्यक्त होती है जबकि मनुष्य मन सरलतम स्वरूप से विशिष्टता की ओर गतिशील होता दिखाई देता है।यह तो स्पष्ट है कि मनुष्य प्रकृति की कृति है और मनुष्य अपनी कृति से अपने जीवन के प्राकृतिक स्वरूप को कुछ हद तक कम या ज्यादा बदल सकता है पर पूरी तरह नहीं बदल सकता। प्रकृति में विशिष्टता, विद्वत्ता और गैर विद्वत्ता का भेद नहीं है प्रकृति सनातन स्वरूप में अभिव्यक्त रहती है जिसमें निरन्तर प्राकृतिक प्रवाह मूल रूप से होता है। उसमें कमी बेशी , बदलाव या ऊंच नीच के भेदभाव  किसी भी स्तर पर या रूप में मौजूद नहीं होते।

    विद्वत्ता और गैर विद्वत्ता मनुष्य समाज में पुरातन काल से चली आ रही एक ऐसी अनोखी अहंकार से परिपूर्ण विचार प्रक्रिया है जिसमें उलझा मनुष्य जीवन को चेतना का जीवंत स्वरूप होने के बाद भी अप्राकृतिक जड़ता के स्वरूप में बदल गया  है। समूची मानव सभ्यता ने अपनी सोच समझ के मानदंड को मान्यता देकर मनुष्य समाज को हमेशा के लिए विद्वत्ता और गैर विद्वत्ता के दो विशेषणों या मानसिक स्वरूपों में बांट दिया है। विद्वत्ता न तो विचार का सर्वोच्च शिखर है और न ही गैर विद्वत्ता, विचार का पाताल लोक। विचार मूल रूप में विचार ही है मनुष्य विचार को विचार की तरह न लेते हुए कई तरह के विशेषणों में बदलने का आदि हो चुका है तभी तो विचार मनुष्य के मन में अपने आप अपनी मौलिकताओं से विस्थापित होकर विद्वत्ता और गैर विद्वत्ता के दो अप्राकृतिक छोर में बट गया ।मनुष्य स्वयं ही विचार के विशेषणात्मक बंटवारे के फलस्वरूप एक अंतहीन चक्रव्यूह में उलझ गया। इसीसे मनुष्य अपने जीवन या अन्तर्मन में स्वयं की प्राकृतिक मनुष्यता को अप्राकृतिक जड़ता की ओर तेजी से निरन्तर बढ़ते रहने से रोक नहीं पाता।  फलस्वरूप प्राकृतिक सहजता का निरन्तर लोप होता है।इस विरोधाभास के लिए मनुष्य की अप्राकृतिक विशेषणात्मक विचार प्रक्रिया की निरन्तर चाहना ही सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। क्या मनुष्य मन या जीवन बिना विशेषण के संभव ही नहीं है?मनुष्य अपने जीवन को जितना अधिक अप्राकृतिक विकास या उन्नति की ओर धकेलने की गति को तेज करता रहेगा उतना मनुष्य का प्राकृतिक स्वरूप परिवर्तित हो कर कृत्रिम जीवन की और निरन्तर बढ़ेगा। कृत्रिम रूप से मनुष्यों के विकास की अंधी जीवन यात्रा ही मनुष्यों की मनुष्यता के प्राकृतिक स्वरूप को कृत्रिम रूप में निरन्तर बदलती रहती है। शायद इस वजह से ही मनुष्य मन में प्राकृतिक प्रवाह और मनुष्य के कृतित्व की जुगलबंदी के द्वंद्व की अभिव्यक्ति होती दिखाई देती है। प्रकृति और मनुष्य का स्वरूप बूंद और समुद्र जैसा ही है। मनुष्य का स्वरूप साकार और नश्वर है पर प्रकृति निराकार स्वरूप में हर कहीं व्याप्त होकर अविनाशी है। प्रकृति में जीवन मौलिक घटना है। मौलिक विचार को श्रेणीबद्ध नहीं किया जा सकता है। प्रकृति का यह प्राकृतिक स्वरूप है कि विचार मनुष्य के मन की आधारभूमि में ही प्रगट होते हैं। मनुष्य के माध्यम से प्रगट विचार भी ऊर्जा का अंतहीन प्रवाह है। जैसे अग्नि भिन्न भिन्न रूप से प्रस्फुटित होकर भी अग्नि ही होती है मात्रा सूक्ष्म या विशाल होती है। हवा मंद हो या आंधी तूफ़ान के रूप में प्रगट हो होती हमेशा हवा ही है। प्रकाश और समय भी सदैव तत्पर रहते हैं। वैसे ही विचार भी मनुष्य मन की अनन्त ऊर्जा का निरन्तर प्रकटीकरण है। मनुष्य मन की आधारभूमि में विचार प्रवाह एक प्राकृतिक अभिव्यक्ति है जो सरलतम सहज जीवन यानी मनुष्यता की जीवन्त एवं अंतहीन अभिव्यक्ति है।