जीवन एक उत्सव है तो वन महोत्सव है !

वन और जीवन हमारी धरती का कभी न खत्म होने वाला या अंतहीन प्राकृतिक गति विधियों  का जीवंत सिलसिला है। यदि धरती पर हम जीवन को उत्सव माने तो धरती पर हर कहीं फैले वनों को जीवन का अनन्त महोत्सव कह सकते हैं। मनुष्य का यह मूल स्वभाव है कि वह शांत या गतिविधि विहीन जीवन नहीं बिता सकता। कविवर भवानी प्रसाद मिश्र की सुप्रसिद्ध एवं कालजयी कविता “सतपुड़ा के घने जंगल नींद में डूबे जंगल, अनमनाते घने जंगल, जितना चाहो धंसो इनमें”। जैसे मनुष्य के चिन्तन मनन और सृजन की कोई सीमा नहीं है वैसे ही वन में निरंतर घट रही उत्सव पंरपरा का कोई अंत नहीं है। मनुष्य तो जीवन भर नाना प्रयास, प्रयोग और प्रयत्न करके उत्सव मनाने का जतन करता रहता हैं और खुद ही खुद की पीठ थपथपाता रहता है। पर वन अपने आपमें मगन रहकर चुपचाप अपने अंदर जिस तरह अनंत गतिविधियों को अपने आप होने देता है उसे देख समझकर तो लगता है कि वन तो अपने आप में घटित होने वाला शांत पर अंतहीन महोत्सव है।वन अकेला झाड़ झंकाड का बेतरतीब सिलसिला नहीं प्राकृतिक जीवन की अनन्त समय से निरंतर जारी प्रक्रियाओं का प्राकृतिक अजायब घर है।वन बिना मास्टर प्लान के प्राकृतिक तंत्र का ऐसा प्राकृतिक समागम है जो अपने  रूप स्वरूप को अपनी तरह से निरंतर इस तरह बदलता रहता है कि मनुष्य आजीवन वनों में होने वाले प्राकृतिक बदलाव को देखते देखते अपने आप को सदैव आनन्द के महासागर में डूबा हुआ महसूस करता है ।कभी भी जंगल से ऊबता नहीं घबराता नहीं बल्कि ऊब से मानव मन को उबारता है। धरती पर वनों की उपस्थिति ने मनुष्य को अपने आप के अकेलेपन से उबारा है।

वन में निराशा नहीं है सब के लिए आशा की किरण और जीवन का अनन्त उत्साह हर समय मौजूद हैं।वन में चीटी से लेकर कीट, पतंगों  से लेकर हाथी जैसे विशालकाय जीव को भी अपने तरीके से जीवन जीने और जीते रहने की प्राकृतिक व्यवस्था अपने आप हैं।वन में आग भी है तो वन अपने आप में प्राकृतिक रूप से लगा बिना माली और फेन्सिग का बाग भी है।वन को इस बात की चिंता नहीं होती कि इसमें कोई घुस जावेगा या इसे कोई काट लेगा।वन का जीवन ही सभी को अपने अंदर प्राकृतिक रूप से जीवन का आनंद आजीवन लेने वाले को आत्मर्पित है। जंगल या वन प्रातंर अनन्त फल फूल और गतिविधियों का ऐसा खुला प्रांगण है जिसमें नित नया महोत्सव अपने आप में घटित होता रहता है।वन धरती का एक ऐसा अनोखा प्रवाह है जो खुद तो ध्यानस्थ दिखाई देता है पर समूचे वन क्षेत्र में जीवन के अनन्त रुपाकार अपने आप जंगल के कोने कोने में बनते बिगड़ते और जन्मते और अपने आप में विलीन होते  हैं। जंगल ही हमें सीखाता है कि जीवन चाहे जीव का हो या वनस्पति का अपने आप में जन्म और विलीन होने का अंतहीन जीवन्त सिलसिला है।वन जीवन की प्राकृतिक कृति है। असंख्य जीव या वनस्पतियों का अनन्त महाकुंभ है वन। हमारे जीवन में समाहित वनों का विराट स्वरूप आम मनुष्य की तरह न तो चिन्तित होता है और न हीं कोई योजना बनाता है फिर भी प्राकृतिक रूप से इस धरती पर जल, जंगल और जमीन के प्राकृतिक स्वरूप को बनाने और क़ायम रखने वाला ऐसा महोत्सव है जिसने जीवन के महासागर को अपने अंदर समाहित कर एक ऐसे अनोखे महोत्सव को प्रारंभ किया है जिसके प्राकृतिक आनन्द को लेने की केवल मनुष्य ही नहीं हर जीव और वनस्पति को खुली आजादी है।हम यह भी कह सकते हैं जीवन जीने की अंतहीन आजादी का नाम है वनों में हर क्षण घटने वाला वन महोत्सव जिसका न कोई आयोजक हैं और न जिसका कभी समापन किया जा सकता है।वन अपने आप में हमारी धरती का अंतहीन प्राकृतिक महोत्सव ही तो है।वन ही जीवन है और जीवन ही वन है। हमारे अपने रूप रंग के भेद से जीवन का स्वरूप और स्वभाव नहीं परिवर्तित होता यही प्रकृति का अमर संदेश हैं। जैसे महासागर में लहरें कभी थमती नहीं वैसे ही वनों में जीवन का अंतहीन महोत्सव थमता नहीं है। युद्ध हो या शांति,दिन हो या रात वन में जीवन का सृजन कभी खत्म नहीं होता है। तभी तो हमारी धरती पर वन है तो जीवन है और जीवन है तो वनों का नित्य नूतन सृजन का अनोखा प्राकृतिक सिलसिला हैं।