आज पांच जून को नईदुनिया की वर्षगांठ हैं,शुभकामनायें और बधाई।नईदुनिया और मेरी उम्र में दो तीन साल का ही अंतर है मैंने ६मई को सत्तर वर्ष पूरे किये।नईदुनिया ५जून को तिहत्तर वर्ष पूरे कर रही है।मैं कह सकता हूं कि मैं नई दुनिया को बचपन से पाठक और लेखक के नाते देख पढ़ रहा हूं इस नाते नईदुनिया का बाल सखा हूं । सन१९६० में जब संत विनोबाभावे एक माह इन्दौर में रहे थे तब नईदुनिया ने प्रतिदिन एक विशेष बुलेटिन निकाला था।जब नईदुनिया निकलना प्रारम्भ हुई तब में और आज में नईदुनिया, शहर इन्दौर, प्रदेश ,देश और दुनिया में सब कुछ बदल गया।छपाई की तकनीक से लेकर लेखन संपादन और पत्रकारिता का तौर तरिका सब कुछ बदल गया हैं।जैसे पहले इन्दौर एक आत्मीय बसाहट थी सब सबको जानते थे पर अब शहर का इतना विस्तार हो गया की जान पहचान के संदर्भ बदल गये घरोपा और अपनापा कहीं खो गया।पाठक और अखबार एकाकार थे अब न नगर और नागरिक में कोई संबंध हैं और न ही पाठक और अखबार में आत्मीयता का कोई रिश्ता।यह आजादी के बाद हर जगह हो रहा हैं।सब कहीं आपाधापी का दौर दिखाई देता हैं।नईदुनिया प्रारम्भ से पाठकों का अखबार था। पाठक भी ऐसे थे जो दूर दराज से अपना कर्तव्य मान खबरों को नईदुनिया के माध्यम से लोगों तक पहुंचाते थे।तब हर जगह पत्रकार या संवाददाता तो होते नहीं थे और श्रद्धेय बाबू लाभचन्दजी छजलानी , आदरणीय नरेन्द्र तिवारीजी और श्री बसंती लालजी सेठिया तीनों का आजादी के आन्दोलन की आगेवान पीढ़ी से निकट संबन्ध सहयोगी भाव था ।इसकारण समूचे मध्यभारत के दूरदराज के लोगों से जान-पहचान और घरोपे जैसा सम्बन्ध था।जैसे लोकतंत्र में जनता की भागीदारी के बिना तंत्र कुछ भी नहीं कर सकता वैसे ही अख़बार भी बिना पाठकों की भागीदारी के कुछ नहीं कर सकता।नई दुनिया ने आंचलिक अखबार होते हुए भी गांव से लेकर समूचे ग्लोब की खबरों से पाठकों को समृद्ध किया।श्री राहुल बारपुते और श्री राजेन्द्र माथुर का संपादन काल अंचल के नौजवानों के अखबारी लेखन का अधोषित स्कूल था।जिससे कई कस्बाई युवकों को पत्रकारिता में प्रवीण होने में स्वयंस्फूर्त मदद मिली।हिन्दी का आंचलिक अखबार लोगो की प्रज्ञा और भागीदारी से आगे बढ़ता गया।राहुलजी और राजेन्द्र माथुर के संपादन काल में संपादक के नाम पत्र की ताकत आम आदमी की ताकत का जीवन्त नमूना था ।समाज और सरकार दोनों पाठको द्वारा उठायी बातों पर ध्यान देते थे।एक तरह से यह पाठकों का शून्यकाल था आप बेखोफ कोई भी मुद्दा उठा या बहस चला सकते थे।संपादक के नाम पत्र लेखकों के संगठन अंचल के कई हिस्सों में बने और उनके बाकायदा सम्मेलन और चुनाव भी होते थे।संपादक के नाम पत्र में चलने वाली बहस लोगों को वैचारिक चिन्तन का आधार देती थी।अखबार लोकचेतना का वाहक और लोकहितों का रखवाला हो तो ही लोगों का लाड़ला होता है।अखबारों की सफलता, ताकत या दौलत केवल अंतहीन अर्थ की प्राप्ती नहीं लोगों की वैचारिक भूख को बनाये रखने में होती है।अखबार व्यावसायिक उत्पाद नहीं होते और पाठक भी महज उपभोक्ता नहीं।आज हम सब पता नहीं कहना और करना क्या चाहते हैं?लिखे और पढ़ें जाने वाले शब्द वैसी वैचारिक ऊर्जा का संचार नहीं कर पाते जो हमारी कलम से लिखे शब्दों ने करना ही चाहिये।सूचना क्रांति का विस्फोट भी इस स्थिति का एक कारक हो सकता हैं।दिन भर वाट्स अप, टेलीविजन से मिलने वाली निरन्तर खबरों व अंतहीन सूचना प्राप्ति के दौर में सुबह पाठक के हाथ में आनेवाला अखबार कैसा हो ?यह सवाल हर दिन निकलने वाले अखबारों के सामने चुनौती है।वैसे जैसी चुनौती हम सब मनुष्यों के जीवन में पिछले डेढ़ वर्ष में आयी है वह एक नया सवाल है।करोना काल ने जीवन को भय मुक्त, निरापद और सतर्क जीवनशैली की तलाश में मोड़ा है।अब हम सब हिलमिल एक नईदुनिया की जीवनशैली कैसे खड़ी करेगें या बनायेंगे यह चुनौती हम सबके सामने है।हम सबकी प्रतिबद्धता सरल ,सहज ,निरापद और भयमुक्त आनन्दमयी जीवन के अलावा और कुछ नहीं हो सकती।अपनी हम उम्र या बालसखा नईदुनिया से वर्ष गांठ पर हक पूर्वक यह भेंट तो मांग ही सकता हूं की नई पीढ़ी के पाठक समाज को लोक-शिक्षक की भूमिका में स्वयंस्फूर्त रूप में आकर करोना काल से उपजे सवालों को हल करने में मदद करें ।पुनःसबके लिये मंगल कामनायें वर्षगांठ पर हार्दिक बधाई।