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मानव बनाम महामारी
युद्धशास्त्र का यह सामान्य सिद्धांत हैं कि हमलावर को परास्त करने के लिये जिन पर हमला होता हैं उन सबने पूरी एकाग्रता से हमलावर को घेर कर परास्त करना चाहिये।हमारी इस विशाल धरती के सबसे बुद्धिशाली मानवों पर ही धरती के हर हिस्से पर महामारी का हमला हुआ है।युद्धशास्त्र के कायदे से तो इस धरती…
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लगातार गुस्सा या तनावपूर्ण मनःस्थिति को त्यागना काल धर्म है।
गुस्सा या तनाव क्षणिक हो तो उसे लहरों की तरह मन में आयी क्षणिक स्थिति ही मनोविज्ञान में मानी जाती है। लगातार गुस्सा या तनाव और कभी भी किसी भी स्थिति में गुस्सा न आना दोनों ही असाधारण मानसिक स्थिति है। कोई किसी बात पर कभी भी गुस्सा न करें तो उसे शांत चित्त या…
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कहानी ,उपन्यास लिखना और पढ़ना धीरज की बात है!
कहानी ,उपन्यास लिखना और पढ़ना दोनों ही बातें हर किसी के बस में नहीं है। असीम धीरज चाहिए।वैसे तो इस दुनिया में कुछ भी किसी के बस में नहीं होता है फिर भी मनुष्य कुछ न कुछ नया करने की जुगाड़ में धीरज के साथ लगा ही रहता है, मनुष्य जब भी कुछ नया सोचता…
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कल्याणकारी राज्य संविधान का मूलतत्त्व
भारत का संविधान भारत के नागरिकों के कल्याण के लिये वचनबद्ध हैं।राज्य के सारे कार्य कलाप और नीतियां नागरिकों के लिये लोकमैत्रीपूर्ण और सभी नागरिकों के प्रति समभाव पूर्ण होना संवैधानिक बाघ्यता है।भारतीय लोकतंत्र,भारतीय समाज और राज्य व्यवस्था तीनों ने वैश्वीकरण की अर्थ व्यवस्था को स्वीकारने की हड़बड़ी में कल्याणकारी राज्य की संवैधानिक बाध्यता को…
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हमारी दृष्टि और मूल्यांकन एकांगी क्यों हैं?
हम में से बहुत कम लोग व्यक्तियों, घटनाओं और विचारों को समग्रता से देख,परख और समझ पाते हैं।देश के लोगो, घटनाओं और विचारों के मूल्यांकन में भी हम सबका अधिकांश, बहुत कृपणदृष्टि और एकांगी सोच समझ वाले मनुष्यों की बिरादरी की तरह हो गया है।हममें से अधिकांश हर छोटी मोटी बात का श्रेय खुद के…
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जीवन कहने से नहीं करने से चलता है
सत्य सनातन है,सत्य की महत्ता सब स्वीकारते हैं। हमारे समूचे जीवन के प्रसंगों में आजीवन सत्य को अपनाने की हम सब प्रायःहिम्मत ही नहीं जुटा पाते। ऐसा करते हुए हम झिझकते भी नहीं।असत्य,सत्य का न होना न होकर सत्य को अपनाने की हिम्मत का न होना है। गांधी ने अपने जीवन को सत्य के प्रयोग…
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अड़ोस पड़ोस स्थायी सुरक्षा का भाव हैं
जैसे विशाल वट वृक्ष की छांव सबकी होती हैं।छांव पर किसी का विशेषाधिकार नहीं हैं।जो वृक्ष के पास आवेगे वे सब वृक्ष की छांव पावेगे।छांव एक परिस्थिति जन्य स्थिति है जिसकी उत्पति और अंत ,काल परिस्थिति अनुसार होता हैं।जैसे अकेला वृक्ष छांव की उत्पति नहीं कर सकता धूप या तेज प्रकाश जरूरी है।यदि धूप या…
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न्यूनतम समान भोजन और जीवन की निरन्तरता
आज के आधुनिक भारत और विकसित दुनिया में विकास की एक रस और बनावटी बहस तो निरन्तर चलायी जाती ही रहती है।पर आज के भारत और समूची दुनिया के सभी लोगों के मन में भोजन के बुनियादी सवालों पर चिंतन तो छोड़िए बातचीत ही नहीं है।आज के भारत में अपच और कुपोषण की जुगलबंदी चल…
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भारत में युवाओं के कारण दिन दूना बढ़ता बाजार!
आज भारत में युवा और बच्चे बाजार की समृद्धि का सबसे बड़ा कारक बन गये है। भारतीय आबादी में युवा और बच्चे बहुसंख्यक बन गये है। बुजुर्ग तेजी से अल्पसंख्यक होते जा रहे हैं। राज, बच्चों और युवाओं के सपनों और ताकत को नहीं समझ पा रहा है। पर बाजार को तो भारतीय आबादी में…