Author: anil trivedi

  • संविधान की दृष्टि बनाम समाज और राजकाज में दृष्टिभेद

    भारत का संविधान अपने नागरिकों के बीच कोई या किसी तरह का भेद नहीं करता।संविधान ने सभी नागरिकों को विधि के समक्ष समानता का मूलभूत अधिकार दिया हैं।पर दैनन्दिन व्यवहार में भारतीय समाज में नामरुप के इतने भेद हैं और संविधान के तहत चलने वाले राजकाज की कार्यप्रणाली भी भेदभाव से मुक्त नहीं हैं।इस तरह…

  • मन और तन की ताकत और श्रमनिष्ठ जीवन

    भारत जैसे विशाल भू-भाग वाले देश में आज के काल में भी छोटी मोटी  मनुष्य बसाहटों में स्थानिय स्तर पर सतत रोजगार की उपलब्धता या अवसरों को बढ़ाने जैसे मूलभूत सवालों को लेकर कोई समग्र दृष्टि और पहल ही मौजूद नहीं है।शरीर श्रम पर जिन्दा मनुष्य किसी तरह जिन्दारहने के लिये अपनी बसाहट, अपना गांव…

  • लाक डाउन के बाद स्वैच्छिक सतर्क जीवन

    लाक डाउन को हम जीवन रक्षा की समझ का खुला विश्वविध्यालय भी मान सकते हैं।इससे पहले किसी महामारी से सारी दुनिया का इतना व्यापक लोक शिक्षण नहीं हुआ।लाक डाउन ने आज तक हम जिस तरह बिना चिन्ता के लापरवाह अंदाज में जीते रहने के आदि थे उसे इतिहास का हिस्सा बना दिया हैं।अब यदि हम…

  • जीवन की ऊर्जा का मूल प्रवाह है आहार

    जीव ,जगत और जीवन इनके आसपास ही तमाम विचार, मत एवं मतान्तर जन्म लेते हैं, विस्तारित होते रहते हैं और विविध रूप- स्वरूपों में दुनिया के लोकमानस में दर्ज हो जाते हैं। ये विविध विचार और मत मतान्तर निरन्तर कालक्रमानुसार लोकमानस की स्मृतियों में उदित या अस्त होते ही रहते हैं। जगत में व्याप्त अनेकानेक…

  • क्षण और अनन्त काल्पनिक गणना के दो बिन्दु है!

    मनुष्य की अवधारणाएं गजब की है। अवधारणाओं का जन्म कल्पना करने की मानवीय क्षमता से हुआ है। मानवीय क्षमता के दो आयाम है पहला शारीरिक और दूसरा मानसिक या वैचारिक। शारीरिक क्षमता की एक सीमा है जो मनुष्य मनुष्य में बदलती रहती है।पर मानसिक या वैचारिक क्षमता की कोई अंतिम सीमा रेखा नहीं है। मनुष्य…

  • क्या इन्दौर लोकसभा चुनाव में नोटा राजनैतिक प्रतिरोध का प्रतीक बनेगा?

    भारत के आम चुनावों में भारतीय मतदाता को केवल अपना मनपसंद जनप्रतिनिधि निर्वाचित करने का ही अधिकार नहीं है भारत के प्रत्येक मतदाता को निर्वाचन में प्रत्याशियों को नापसंद करने का भी संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। भारतीय मतदाता की सामान्य बुद्धि पर भारत का संविधान पूरा-पूरा भरोसा करता है तभी तो मतदान पत्र में निर्वाचन…

  • हमारे पास आज है, कल भी आज ही होगा

    सनातन समय से हम याने मनुष्यों को आध्यत्मिक वृत्ति के दार्शनिक चिंतक विचारक समझाते रहे हैं कि हमें वर्तमान में जीना चाहिए।वस्तुत:हम पूरा जीवन वर्तमान में ही जीते हैं।हमारे पूरे जीवन काल में वर्तमान ही होता हैं।याने हमारे पास आज हैं,कल भी आज ही होगा।कल आज और कल।हमारी समझ के लिये काल की सबसे आसान…

  • गति सदगति दुर्गति 

    गति का शाब्दिक अर्थ हैं किसी स्थान से दूसरे स्थान पर जाने की क्रिया।सदगति याने सदा चलते रहने वाला जैसे सूर्य या हवा।दुर्गति का सामान्य अर्थ होता हैं बुरी गति या दुर्दशा।इस रूप में जीवन को समझें तो जीवन में भी हर पल यहीं क्रम दिखाई देता हैं।जन्म से मृत्यु तक जाने की क्रिया या…

  • घुमक्कड़ी का आनन्द

    कुदरत ने हम सब को घुमक्कड़ी करने के लिये ही दो पैर दिये हैं।पर ज्ञान विज्ञान और तकनीक के विस्तार ने पैर पैदल घुमक्कड़ी को पीछे धकेल कर सुबह शाम के एक रस पैदल टहलने की रस्म अदायी में बदल दिया हैं।एक जोड़ी मनुष्य के पैरों ने धरती के चप्पे चप्पे पर अपनी पद छाप…

  • धरती की जीवन और भोजन श्रृखंला

    जीवन और भोजन दोनों एक दूसरे से इस कदर एकाकार हैं कि दोनों की एक दूसरे के बिना कल्पना भी नहीं की जा सकती हैं।जीवन हैं तो भोजन अनिवार्य हैं।भोजन के बिना जीवन की निरंतरता का क्रम ही खण्डित हो जाता हैं।जीवन श्रृखंला पूरी तरह भोजन श्रृखंला पर हीं निर्भर हैं।कुदरत ने धरती के हर…