आज के आधुनिक भारत और विकसित दुनिया में विकास की एक रस और बनावटी बहस तो निरन्तर चलायी जाती ही रहती है।पर आज के भारत और समूची दुनिया के सभी लोगों के मन में भोजन के बुनियादी सवालों पर चिंतन तो छोड़िए बातचीत ही नहीं है।आज के भारत में अपच और कुपोषण की जुगलबंदी चल रही है जिससे स्वस्थ तन मन और पोषण का अकाल हो गया है। यदि दुनिया के किसी देश की अधिकांश आबादी कुपोषण और अपच से ग्रस्त हो तो सामान्य निष्कर्ष यही निकलता है कि दुनिया में सबको न्यूनतम समान भोजन उपलब्ध नहीं है। पिछले कुछ सालों से भारत में समान पाठ्यक्रम, परिक्षाओं,समान वेशभूषा जैसे मुद्दों पर तो सतही बातचीत हुई। पर भारत के हर आयु , इलाके और आर्थिक ,सामाजिक और भौगोलिक पृष्ठभूमि वाले लोगो और प्राणियों को दोनों समय न्यूनतम पौष्टिक आवश्यकतानुसार भोजन मिल सके इतना मात्र राष्ट्रीय संकल्प हमारे मन में आया ही नहीं। भोजन की असमानता के चलते भारत की अधिकांश आबादी कुपोषण और अपच जैसे परस्पर विरोधी स्वरूप में बंट गई। किसी भी देश और समाज को अपने नागरिक को न्यूनतम पौष्टिक आहार या भोजन उपलब्ध करवाना नागरिक गरिमा को बनाए रखने का न्यूनतम संकल्प होने के साथ-साथ कल्याणकारी राज्य का संवैधानिक दायित्व भी है।आज के भारत का राज्य, समाज और बाजार तीनों ही भारतीय नागरिक के भोजन में न्यूनतम समानता उपलब्ध करवाने के मूलभूत सिद्धांत को पूरी तरह से मानने से इंकार कर रहे हैं। स्थिति यहां यह बन गई है कि भोजन में न्यूनतम समानता का विचार देश और दुनिया में किसी भी स्तर पर विचार विमर्श का विषय ही नहीं है। मनुष्य के लिए दुनिया भर में भोजन की प्रतिदिन और निरन्तर उपलब्धता सारी दुनिया की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। पर इसके विपरित सारी दुनिया जीवन के गैर जरूरी और दिखावटी विषयों पर तो निरन्तर चर्चा या विचार विमर्श करती है पर न्यूनतम समानता वाले भोजन को चिन्तन और जीवन की पहली और बुनियादी प्राथमिकता बनाने पर कोई बात ही नहीं करता तभी तो अब तक इस मुद्दे पर बहस ही नहीं खड़ी हो सकी है। पुरानी और प्राकृतिक जीवन प्रणाली के कालखंड में मनुष्य अपनी समझ , पहल या अंतहीन प्रयत्नों से अपना-अपना भोजन जुटाते रहना ही मनुष्य जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था। पर आधुनिक और विकसित दुनिया में सारी दुनिया के जीवन का ताना-बाना ऐसा बना दिया गया है कि समूचे मनुष्य समाज के भोजन में न्यूनतम समानता की बात अब एक अकेले मनुष्य के प्रतिदिन के प्रयत्नों से संभव ही नहीं है।राज, समाज और बाजार ने मनुष्य जीवन को चारों दिशाओं से ऐसे जकड़बंदी में ले लिया है। जिससे न्यूनतम समानता वाला भोजन व्यवस्था की जकड़बंदी में उलझ गया। लाचार , भूखा-प्यासा मनुष्य अकेला और असहाय महसूस कर रहा है। आजकल की दुनिया में मनुष्य का जीवन पहली प्राथमिकता न होकर राज समाज और बाजार की जकड़बंदी वाली व्यवस्था ताकतवर बन गई है।
आधुनिक दुनिया में न्यूनतम समानता वाले भोजन की अनुपलब्धता के कारण समूची दुनिया में कुपोषण और अपच मनुष्य जीवन का पर्याय बनता जा रहा है। स्वस्थ प्रसन्न जीवन कम तथा कुपोषित, भूखा-प्यासा मनुष्य जीवन सारी दुनिया में निरन्तर बढ़ता ही जा रहा है। दुनिया में भोजन की अनुपलब्धता का कारण दुनिया की जनसंख्या में होने वाली वृद्धि नहीं है। आधुनिक दुनिया की मनुष्य जीवन की प्राथमिक जिम्मेदारी को लेकर जो व्यवस्थागत जड़ मानसिकता बन गई है उसे बदले बिना दुनिया के मनुष्यों को न्यूनतम समानता वाले भोजन की व्यवस्था नहीं हो सकती। जीवन में भोजन का कोई विकल्प नहीं है। भोजन जीवन की प्राकृतिक जरूरत है। इससे प्रकृति ने हमारी पृथ्वी पर भोजन की निरन्तर प्राकृतिक श्रृंखला को जीवन की निरन्तरता बनाए रखने के लिए जीवन्त रूप में हर कहीं व्यक्त किया है। आधुनिक युग का मनुष्य और समूची वैश्विक व्यवस्था भोजन की उपलब्धता को अर्थ व्यवस्था का विषय बनाने में लगे हुए हैं। इससे दुनिया भर में भोजन जीवन की प्राथमिक और प्राकृतिक जरूरत के बजाय राज और बाजार का विषय बन गया है।आज की आधुनिक विश्व बाजार, विकास और तकनीकी विस्तार की जटिल दुनिया में भोजन जीवन की प्राकृतिक जरूरत के बजाय विश्व व्यापार और राजकाज की बुनियादी समझ के अभाव का एक हिस्सा बन चुका है।समान न्यूनतम भोजन के अभाव में सारी दुनिया निरन्तर अस्वस्थ, असहाय और लाचार जीवन का पर्याय ही बनती रहेगी। केवल मनुष्य ही नहीं दुनिया भर में मौजूद सारे जीवों को चाहे वे प्राणी हो या वनस्पति हम दवाईयों और अप्राकृतिक खुराक से जीवन्त और स्वस्थ नहीं रख सकते हैं। जीवन क्रम व्यवस्था और राजकाज या व्यापार व्यवसाय का विषय नहीं है। जीवन इस धरती पर एक प्राकृतिक भोजन श्रृंखला के रूप में निरन्तर अस्तित्व में है। आधुनिक युग का मनुष्य चाहे जितना ताकतवर और विकसित हो जावे उसके जीवन की निरन्तरता न्यूनतम समान भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित रखें रहने में ही है ।इस प्राकृतिक भोजन श्रृंखला का कोई विकल्प आज हमारी पृथ्वी पर मौजूद जीवन के पास है ही नहीं यह भोजन का विकल्प ढूंढ रहे विज्ञान, तकनीक और आधुनिक विकास के दिवानों को समझना चाहिए।